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Aatish Alok
ghaav mere haraa kare koii
ghaav mere haraa kare koii | घाव मेरे हरा करे कोई
- Aatish Alok
घाव
मेरे
हरा
करे
कोई
क्यूँ
तुम्हें
बद्दुआ
करे
कोई
कैसे
कैसों
के
हाथ
आई
है
इश्क़
तेरा
भला
करे
कोई
बे-कली
ख़त्म
होती
जाती
है
ज़ख़्म
को
फिर
हवा
करे
कोई
शर्त
है
क़त्ल
हो
मेरा
और
ये
काम
भी
बे-वफ़ा
करे
कोई
रूह
छालों
से
भर
गई
हो
जब
ज़ख़्म
से
ही
सजा
करे
कोई
- Aatish Alok
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दिन
ढल
गया
और
रात
गुज़रने
की
आस
में
सूरज
नदी
में
डूब
गया,
हम
गिलास
में
Rahat Indori
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रो
रहा
था
गोद
में
अम्माँ
की
इक
तिफ़्ल-ए-हसीं
इस
तरह
पलकों
पे
आँसू
हो
रहे
थे
बे-क़रार
जैसे
दीवाली
की
शब
हल्की
हवा
के
सामने
गाँव
की
नीची
मुंडेरों
पर
चराग़ों
की
क़तार
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Ehsan Danish
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ये
जो
है
फूल
हथेली
पे
इसे
फूल
न
जान
मेरा
दिल
जिस्म
से
बाहर
भी
तो
हो
सकता
है
Abbas Tabish
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बहरस
ख़ारिज
हूँ
ये
मालूम
है
पर
तुम्हारी
ही
ग़ज़ल
का
शे'र
हूँ
Gyan Prakash Akul
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फूल
के
होंठों
से
ख़ुश्बू
के
मआनी
सुनकर
अपना
शे'र
अच्छा
लगा
तेरी
ज़ुबानी
सुनकर
Rajesh Reddy
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मैं
बाग़
में
जिस
जगह
खड़ा
हूँ
हर
फूल
से
काम
चल
रहा
है
Shaheen Abbas
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वो
शाख़
है
न
फूल,
अगर
तितलियाँ
न
हों
वो
घर
भी
कोई
घर
है
जहाँ
बच्चियाँ
न
हों
Bashir Badr
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दूर
इक
सितारा
है
और
वो
हमारा
है
आँख
तक
नहीं
लगती
कोई
इतना
प्यारा
है
छू
के
देखना
उसको
क्या
अजब
नज़ारा
है
तीर
आते
रहते
थे
फूल
किसने
मारा
है
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Kafeel Rana
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मुझे
भी
बख़्श
दे
लहजे
की
ख़ुशबयानी
सब
तेरे
असर
में
हैं
अल्फ़ाज़
सब,
म'आनी
सब
मेरे
बदन
को
खिलाती
है
फूल
की
मानिंद
कि
उस
निगाह
में
है
धूप,
छाँव,
पानी
सब
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Subhan Asad
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नाम
लिख
लिख
के
तिरा
फूल
बनाने
वाला
आज
फिर
शबनमीं
आँखों
से
वरक़
धोता
है
Ghulam Mohammad Qasir
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जो
रुका
हुआ
था
रुका
रहा
जो
रुका
नहीं
उसे
रोकना
ये
अजब
रिवाज़
है
इश्क़
का
जो
रुका
नहीं
उसे
रोकना
मैं
कभी
कभी
हूँ
ये
सोचता
कि
हवा
को
हाथ
से
रोक
लूँ
मैं
कभी
कभी
हूँ
ये
चाहता
जो
रुका
नहीं
उसे
रोकना
न
मुझे
सुकून
न
नींद
ही
न
मिलेगा
चैन
ही
एक
दिन
ये
बहुत
दिनों
मुझे
खाएगा
जो
रुका
नहीं
उसे
रोकना
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Aatish Alok
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छोड़
जाने
का
बहाना
चाहिए
था
तो
मुझे
पहले
बताना
चाहिए
था
कैसे
हँसते
हो
भला
उस
बात
पर
तुम
जिस
में
तुमको
डूब
जाना
चाहिए
था
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Aatish Alok
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इश्क़
में
कितनी
पागल
है
वो
बुद्धू
सी
लड़की
देखो
तो
जो
गिला
करो
तो
हँसती
है
ता'रीफ़ों
पे
रो
देती
है
Aatish Alok
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कहने
को
तो
दुनिया
तेरी
बहुत
बड़ी
सी
है
मौला
मेरे
ग़म
के
आगे
लेकिन
कितनी
छोटी
है
मौला
तू
भी
तो
हरदम
केवल
उसकी
ही
सुनता
रहता
है
दुनिया
भी
तेरी
बिल्कुल
ही
तेरे
जैसी
है
मौला
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Aatish Alok
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अपनी
अना
को
छोड़
तेरे
दर
में
आ
गया
तुम
सोचने
लगे
कि
बराबर
में
आ
गया
पंछी
तो
जाल
में
है
फँसा
जानबूझकर
सय्याद
सोचता
है
कि
चक्कर
में
आ
गया
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Aatish Alok
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