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Aatish Alok
banaane ko banaa saka hooñ tere dil men ghar ye jaanta hooñ main
banaane ko banaa saka hooñ tere dil men ghar ye jaanta hooñ main | बनाने को बना सकता हूँ तेरे दिल में घर ये जानता हूँ मैं
- Aatish Alok
बनाने
को
बना
सकता
हूँ
तेरे
दिल
में
घर
ये
जानता
हूँ
मैं
मगर
घर
तोड़ने
वालों
के
घर
में
घर
बनाना
है
नहीं
मुझको
- Aatish Alok
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उसे
अभी
भी
मेरे
दिल
के
हाल
का
नहीं
पता
तो
यानी
उसको
अपने
घर
का
रास्ता
नहीं
पता
ये
तेरी
भूल
है
ऐ
मेरे
ख़ुश-ख़याल
के
मुझे
पराई
औरतों
से
तेरा
राब्ता
नहीं
पता
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Ruqayyah Maalik
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कहाँ
रोते
उसे
शादी
के
घर
में
सो
इक
सूनी
सड़क
पर
आ
गए
हम
Shariq Kaifi
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हमारे
घर
की
दीवारों
पे
'नासिर'
उदासी
बाल
खोले
सो
रही
है
Nasir Kazmi
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सारी
हिम्मत
टूट
गई,
बच्चों
से
ये
सुनकर
अब
भूखे
पेट
गुज़ारा
करने
की
हिम्मत
है
फूँका
घर,
भूखे
बच्चे,
टूटी
उम्मीदें,
अब
मुझ
में,
रस्सी
को
फंदा
करने
की
हिम्मत
है
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Aman G Mishra
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सफ़र
के
बाद
भी
ज़ौक़-ए-सफ़र
न
रह
जाए
ख़याल
ओ
ख़्वाब
में
अब
के
भी
घर
न
रह
जाए
Abhishek shukla
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कुछ
भी
नहीं
तो
पेड़
की
तस्वीर
ही
सही
घर
में
थोड़ी
बहुत
तो
हरियाली
चाहिये
Himanshu Kiran Sharma
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आप
क्या
आए
कि
रुख़्सत
सब
अंधेरे
हो
गए
इस
क़दर
घर
में
कभी
भी
रौशनी
देखी
न
थी
Hakeem Nasir
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अभी
ज़िंदा
है
माँ
मेरी
मुझे
कुछ
भी
नहीं
होगा
मैं
घर
से
जब
निकलता
हूँ
दु'आ
भी
साथ
चलती
है
Munawwar Rana
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उन
के
होने
से
बख़्त
होते
हैं
बाप
घर
के
दरख़्त
होते
हैं
Unknown
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समझ
के
आग
लगाना
हमारे
घर
में
तुम
हमारे
घर
के
बराबर
तुम्हारा
भी
घर
है
Hafeez Banarasi
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छोड़
जाने
का
बहाना
चाहिए
था
तो
मुझे
पहले
बताना
चाहिए
था
कैसे
हँसते
हो
भला
उस
बात
पर
तुम
जिस
में
तुमको
डूब
जाना
चाहिए
था
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Aatish Alok
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आँखें
तब
से
रौशन
हैं
बोलो
मैं
क्या
कर
सकता
हूँ?
वो
शब
भर
देखा
था
कल
तुमको
मैं
क्या
कर
सकता
हूँ?
तुम
कहती
हो
तुमको
सुंदर
केवल
मैं
ही
कहता
हूँ
अब
सारी
दुनिया
अंधी
है
तो
मैं
क्या
कर
सकता
हूँ?
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Aatish Alok
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शहर
में
भी
मैं
नहीं
जो
तुमको
पाया
लौट
आया
जब
उजाले
ने
ही
मुझको
काट
खाया
लौट
आया
इक
तरफ़
तो
थी
चमक
औ
इक
तरफ़
था
गाँव
मेरा
जैसे
ही
मैं
चौंधियाया
सर
घुमाया
लौट
आया
तुम
अना
पर
आ
गई
थी
सो
बताना
था
ज़रूरी
पा
भी
सकता
हूँ
मैं
तुमको
ये
बताया
लौट
आया
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Aatish Alok
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घाव
मेरे
हरा
करे
कोई
क्यूँ
तुम्हें
बद्दुआ
करे
कोई
कैसे
कैसों
के
हाथ
आई
है
इश्क़
तेरा
भला
करे
कोई
बे-कली
ख़त्म
होती
जाती
है
ज़ख़्म
को
फिर
हवा
करे
कोई
शर्त
है
क़त्ल
हो
मेरा
और
ये
काम
भी
बे-वफ़ा
करे
कोई
रूह
छालों
से
भर
गई
हो
जब
ज़ख़्म
से
ही
सजा
करे
कोई
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Aatish Alok
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एक
परिंदा
मर
गया
ये
शाप
देकर
नेटवर्कों
में
फँसोगे
तुम
भी
एक
दिन
Aatish Alok
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