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Aamir Ali
raho tum bhi yuñ jaise gham raha hai
raho tum bhi yuñ jaise gham raha hai | रहो तुम भी यूँँ जैसे ग़म रहा है
- Aamir Ali
रहो
तुम
भी
यूँँ
जैसे
ग़म
रहा
है
मोहब्बत
का
यही
आलम
रहा
है
यहाँ
खिलता
नहीं
है
फूल
कोई
यहाँ
मौसम
भी
बे-मौसम
रहा
है
तुम्हें
क्या
याद
है
वो
पल
हमारे
यही
शिकवा
मुझे
हर
दम
रहा
है
ये
काग़ज़
पे
बिखरते
लफ़्ज़
देखो
पिघलते
अश्क
में
ख़ूँ
जम
रहा
है
कहीं
कोई
मेरे
जैसा
भी
'आमिर'
ख़ुदा
की
क़ैद
में
आदम
रहा
है
- Aamir Ali
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चूमा
था
एक
दिन
किसी
गुल
की
जबीन
को
लहजे
से
आज
तक
मेरे
ख़ुश्बू
नहीं
गई
Afzal Ali Afzal
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ये
जो
है
फूल
हथेली
पे
इसे
फूल
न
जान
मेरा
दिल
जिस्म
से
बाहर
भी
तो
हो
सकता
है
Abbas Tabish
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महीनों
फूल
भिजवाने
पड़े
थे
वो
पहली
बार
जब
रूठा
था
मुझ
से
Varun Anand
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कमी
कमी
सी
थी
कुछ
रंग-ओ-बू-ए-गुलशन
में
लब-ए-बहार
से
निकली
हुई
दु'आ
तुम
हो
Ali Sardar Jafri
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मैं
बाग़
में
जिस
जगह
खड़ा
हूँ
हर
फूल
से
काम
चल
रहा
है
Shaheen Abbas
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अपने
होंटों
से
कहो
फूल
को
चू
में
हर
रोज़
जब
मेरे
लब
नहीं
होंगे
तो
सहूलत
होगी
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Shahbaz Rizvi
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ये
भँवरे
रौशनी
खो
देंगे
अपनी
आँखों
की
अगर
चमन
में
जो
कलियाँ
नक़ाब
ओढेंगी
Shajar Abbas
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वक़्त
ही
कम
था
फ़ैसले
के
लिए
वर्ना
मैं
आता
मशवरे
के
लिए
तुम
को
अच्छे
लगे
तो
तुम
रख
लो
फूल
तोड़े
थे
बेचने
के
लिए
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Zia Mazkoor
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न
उन
लबों
पे
तबस्सुम
न
फूल
शाख़ों
पर
गुज़र
गए
हैं
जो
मौसम
गुज़रने
वाले
थे
Kaif Uddin Khan
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तुम
सेे
जो
मिला
हूँ
तो
मेरा
हाल
है
बदला
पतझड़
में
भी
जैसे
के
कोई
फूल
खिला
हो
Haider Khan
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गिला
है
न
शिकवा
है
कोई
रक़ीबों
में
अपना
है
कोई
वो
आला
या
अदना
है
कोई
वो
दावा-ए-तक़्वा
है
कोई
वो
आवाज़
देता
नहीं
अब
मुझे
यूँँ
भी
रखता
है
कोई
ये
दामन
अगर
तुम
हटा
दो
तो
जाने
कि
सपना
है
कोई
नया
साल
आने
को
है
अब
तेरी
राह
तकता
है
कोई
ये
ज़ुल्म-ओ-सितम
क्या
है
आमिर
यूँँ
वहशत
भी
लिखता
है
कोई
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Aamir Ali
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आईने
भी
अक्स
जब
खाने
लगे
फिर
जहालत
झूठ
फैलाने
लगे
हुर्रियत
आदी
हैं
ये
वाइज़
तेरे
मस्जिदों
से
मय-कदे
जाने
लगे
ज़ेब-ओ-ज़ीनत
कुछ
है
कुछ
फ़हम-ओ-फ़तन
ये
कहा
जो
तुम
तो
इतराने
लगे
दौर
कैसा
पेश
आया
है
कि
अब
ये
मुनाफ़िक़
भी
तुझे
भाने
लगे
देखने
पर
तो
मेरे
खिलते
थे
तुम
बात
क्या
गुज़री
जो
मुरझाने
लगे
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Aamir Ali
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सहरा
में
घूँट
घूँट
सा
वो
आब
इश्क़
है
अब
नींद
करवटों
में
है
और
ख़्वाब
इश्क़
है
Aamir Ali
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सबब
बे-सबब
याद
करता
रहा
मैं
बयाबान
आबाद
करता
रहा
मैं
सुना
शे'र
ग़ालिब
का
फ़रहाद
पर
जब
तो
फ़रहाद
फ़रहाद
करता
रहा
मैं
हवाएँ
बनी
ज़ुल्म
की
दास्ताँ-गो
परिंदों
की
इमदाद
करता
रहा
मैं
सर-ए-आम
दुश्मन
करे
अब
तमाशा
तो
इरशाद
इरशाद
करता
रहा
मैं
ज़माना
बड़ा
सख़्त
गुज़रा
है
'आमिर'
ज़माने
से
फ़रियाद
करता
रहा
मैं
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Aamir Ali
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शब-ए-ग़म
में
हैं
राज़
कितने
पिरोए
यूँँ
अल्फ़ाज़
कितने
उठा
रेशमी
लाल
पर्दा
दिखाई
पड़े
साज़
कितने
वफ़ा
महज़
बातें
रही
है
वफ़ादार
हमराज़
कितने
ये
काँटे
ये
पत्थर
ये
ख़ंजर
हैं
अपनों
से
नाराज़
कितने
हैं
कुछ
दाग़
उस
चाँद
पर
जो
सुख़न-वर
भी
लफ़्फ़ाज़
कितने
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Aamir Ali
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