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Shubham Rai 'shubh'
sikandar milenge bahut ik jagah par
sikandar milenge bahut ik jagah par | सिकंदर मिलेंगे बहुत इक जगह पर
- Shubham Rai 'shubh'
सिकंदर
मिलेंगे
बहुत
इक
जगह
पर
कभी
शाम
तुम
मय-कदे
में
गुज़ारो
- Shubham Rai 'shubh'
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मंज़िल
पे
न
पहुँचे
उसे
रस्ता
नहीं
कहते
दो
चार
क़दम
चलने
को
चलना
नहीं
कहते
इक
हम
हैं
कि
ग़ैरों
को
भी
कह
देते
हैं
अपना
इक
तुम
हो
कि
अपनों
को
भी
अपना
नहीं
कहते
कम-हिम्मती
ख़तरा
है
समुंदर
के
सफ़र
में
तूफ़ान
को
हम
दोस्तो
ख़तरा
नहीं
कहते
बन
जाए
अगर
बात
तो
सब
कहते
हैं
क्या
क्या
और
बात
बिगड़
जाए
तो
क्या
क्या
नहीं
कहते
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Nawaz Deobandi
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इश्क़
अगर
बढ़ता
है
तो
फिर
झगड़े
भी
तो
बढ़ते
हैं
आमदनी
जब
बढ़ती
है
तो
ख़र्चे
भी
तो
बढ़ते
हैं
माना
मंज़िल
नहीं
मिली
है
हमको
लेकिन
रोज़ाना
एक
क़दम
उसकी
जानिब
हम
आगे
भी
तो
बढ़ते
हैं
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Tanoj Dadhich
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और
उसको
ढूढ़ता
मैं
किस
जगह
पास
ही
थी
और
कितनी
दूर
थी
Umesh Maurya
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किसी
के
दिल
में
जगह
किस
तरह
बनानी
है
ये
सीखने
की
हो
चाहत
हमारे
शे'र
सुनो
Kashif Adeeb Makanpuri
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मेरा
भी
एक
बाप
था
अच्छा
सा
एक
बाप
वो
जिस
जगह
पहुँच
के
मरा
था
वहीं
हूँ
मैं
Rais Farog
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आपने
मुझको
डुबोया
है
किसी
और
जगह
इतनी
गहराई
कहाँ
होती
है
दरिया
में
Tehzeeb Hafi
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तू
उसके
दिल
में
जगह
चाहता
है
यार
जो
शख़्स
किसी
को
देता
नहीं
अपने
साथ
वाली
जगह
Umair Najmi
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चले
चलिए
कि
चलना
ही
दलील-ए-कामरानी
है
जो
थक
कर
बैठ
जाते
हैं
वो
मंज़िल
पा
नहीं
सकते
Hafeez Banarasi
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मिलने
का
वा'दा
उन
के
तो
मुँह
से
निकल
गया
पूछी
जगह
जो
मैंने
कहा
हँस
के
ख़्वाब
में
Unknown
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अपनी
मंज़िल
पे
पहुँचना
भी
खड़े
रहना
भी
कितना
मुश्किल
है
बड़े
हो
के
बड़े
रहना
भी
Shakeel Azmi
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अना
पर
बात
आए
लहरों
को
भी
मोड़
दूँगा
कटे
गर्दन
भले
तेरी
अकड़
मैं
तोड़
दूँगा
रहूँगा
शान
से
चाहे
खड़ी
हो
मौत
सम्मुख
झुकाऊँगा
न
सर
अपना
ये
साँसें
छोड़
दूँगा
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Shubham Rai 'shubh'
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कर
दिया
क़ुर्बान
इक
ख़्वाहिश
मियाँ
दुश्मन-ए-जाँ
अब
मनाओ
जश्न
तुम
Shubham Rai 'shubh'
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सवाल
क्या
है
जवाब
क्या
है
खुले
न
आँखें
तो
ख़्वाब
क्या
है
ज़बाँ
सही
है
अगर
तुम्हारी
तू
ही
बता
फिर
ख़राब
क्या
है
मिटेंगे
हम
तो
मिटोगे
तुम
भी
या
पूछ
राह-ए-सवाब
क्या
है
सफ़र
में
जिनके
भरे
हों
काँटें
जा
पूछ
उन
सेे
गुलाब
क्या
है
मिले
जो
इज़्ज़त
बिना
ख़रीदे
तो
इस
सेे
ज़्यादा
निसाब
क्या
है
रहे
सलामत
जो
दोस्ताना
बड़ा
जहाँ
में
ख़िताब
क्या
है
रहे
ये
जीवन
जो
निष्कलंकित
तो
इस
सेे
बढ़िया
किताब
क्या
है
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Shubham Rai 'shubh'
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जो
लगेगा
मौक़ा
तो
पूछेंगे
हम
इश्क़
ये
मरहम
है
तो
किसके
लिए
Shubham Rai 'shubh'
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अश्क
का
ये
बहाव
कैसा
राख
है,
तो
अलाव
कैसा
है
सुना
की
सुशील
है
वो
तो
अभी
ये
सुभाव
कैसा
है
अडिग
वो
ज़ुबान
का
तो
बात
से
अब
घुमाव
कैसा
दोस्त
तो
हैं
सभी
बराबर
आज
फिर
से
चुनाव
कैसा
ज़िंदगी
में
सभी
मिला
है
यार
तो
अब
अभाव
कैसा
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Shubham Rai 'shubh'
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