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Shubham Rai 'shubh'
dard le aap ke paas se aa ga.e
dard le aap ke paas se aa ga.e | दर्द ले आप के पास से आ गए
- Shubham Rai 'shubh'
दर्द
ले
आप
के
पास
से
आ
गए
हाँ
मुलाक़ात
कर
ख़ास
से
आ
गए
और
बोतल
उठाया
गला
तर
करूँँ
जाम
के
बाद
रख
प्यास
भी
आ
गए
- Shubham Rai 'shubh'
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कहीं
से
दुख
तो
कहीं
से
घुटन
उठा
लाए
कहाँ-कहाँ
से
न
दीवानापन
उठा
लाए
अजीब
ख़्वाब
था
देखा
के
दर-ब-दर
हो
कर
हम
अपने
मुल्क
से
अपना
वतन
उठा
लाए
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Farhat Abbas Shah
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दिल
ना-उमीद
तो
नहीं
नाकाम
ही
तो
है
लंबी
है
ग़म
की
शाम
मगर
शाम
ही
तो
है
Faiz Ahmad Faiz
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अपनी
तबाहियों
का
मुझे
कोई
ग़म
नहीं
तुम
ने
किसी
के
साथ
मोहब्बत
निभा
तो
दी
Sahir Ludhianvi
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तुम्हारे
बाद
इस
आँगन
में
फूल
खिलने
पर
ख़ुशी
हुई
भी
तो
ये
दुख
हुआ
कि
दें
किसको
Mohit Dixit
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तू
अपने
सारे
दुख
जाकर
बताता
है
जिन्हें,
इक
दिन
बढ़ाएँगे
वही
ग़म-ख़्वार
तेरी
आँख
का
पानी
Siddharth Saaz
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दुनिया
ने
तेरी
याद
से
बेगाना
कर
दिया
तुझ
से
भी
दिल-फ़रेब
हैं
ग़म
रोज़गार
के
Faiz Ahmad Faiz
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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ज़िंदगी
क्या
किसी
मुफ़लिस
की
क़बा
है
जिस
में
हर
घड़ी
दर्द
के
पैवंद
लगे
जाते
हैं
Faiz Ahmad Faiz
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न
आया
ग़म
भी
मोहब्बत
में
साज़गार
मुझे
वो
ख़ुद
तड़प
गए
देखा
जो
बे-क़रार
मुझे
Asad Bhopali
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भला
तुम
कैसे
जानोगे
मिला
है
दर्द
जो
गहरा
वो
जैसे
नोचता
है
बाल
अपने
नोच
कर
देखो
Kushal "PARINDA"
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कर
दिया
क़ुर्बान
इक
ख़्वाहिश
मियाँ
दुश्मन-ए-जाँ
अब
मनाओ
जश्न
तुम
Shubham Rai 'shubh'
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कि
जीवन
का
हर
इक
नज़ारा
समझते
फ़क़त
तुम
जो
मेरा
इशारा
समझते
समझते
अगर
मुझको
अपना
कभी
तुम
तो
मुझ
जैसे
जुगनू
को
तारा
समझते
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Shubham Rai 'shubh'
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पुकारो
न
तुम
आने
वाला
नहीं
हूँ
किसी
को
दिशा
मैं
दिखाता
नहीं
हूँ
ख़ुदा
पर
भरोसा
बहुत
है
मगर
बस
मुक़द्दर
भरोसे
भी
बैठा
नहीं
हूँ
चलेगी
क़लम
चाहे
सर
हो
क़लम
पर
कभी
झूठ
के
दर
पे
ठहरा
नहीं
हूँ
सताने
लगे
जब
ज़माने
के
सच्चे
उसी
दिन
समझना
अकेला
नहीं
हूँ
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Shubham Rai 'shubh'
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क़बीले
के
अपने
वफ़ादार
तुम
हो
हो
जनता
की
हामी
या
इनकार
तुम
हो
हक़ीक़त
क़लम
से
निकलती
नहीं
है
ख़रीदा
हुआ
जैसे
अख़बार
तुम
हो
दिखाओगे
तुम
तो
धमक
रंगदारी
है
नेता
सभी
गुंडे
सरकार
तुम
हो
दिखाकर
के
सपने
जो
काटी
हैं
ज़ेबें
गरीबों
के
कैसे
मददगार
तुम
हो
ग़नीमत
है
हम
बोल
देते
हैं
वर्ना
भगत
सब
तुम्हारे
निराकार
तुम
हो
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Shubham Rai 'shubh'
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वक़्त-बे-वक़्त
उसको
बुलाया
नहीं
शख़्स
जो
साथ
मेरा
निभाया
नहीं
साथ
उसके
बिना
हम
चले
थे
मगर
रास्ते
ने
भी
मुझको
गिराया
नहीं
जिस
ज़माने
से
डरते
रहे
उम्र
भर
उस
ज़माने
ने
अपना
बनाया
नहीं
वो
भी
इल्ज़ाम
मुझपे
लगाते
रहे
इक
घड़ी
साथ
जिसने
बिताया
नहीं
तीर
इतने
सहे
तंज़
के
दोस्तों
वक़्त
आया
तो
हमने
चलाया
नहीं
हार
मिलती
अगर,सब
सुनाते
मुझे
जीत
पर
कोई
मुझको
सराहा
नहीं
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Shubham Rai 'shubh'
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