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Shubham Rai 'shubh'
ki jeevan ka har ik nazaara samajhte
ki jeevan ka har ik nazaara samajhte | कि जीवन का हर इक नज़ारा समझते
- Shubham Rai 'shubh'
कि
जीवन
का
हर
इक
नज़ारा
समझते
फ़क़त
तुम
जो
मेरा
इशारा
समझते
समझते
अगर
मुझको
अपना
कभी
तुम
तो
मुझ
जैसे
जुगनू
को
तारा
समझते
- Shubham Rai 'shubh'
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ऐ
शौक़-ए-नज़ारा
क्या
कहिए
नज़रों
में
कोई
सूरत
ही
नहीं
ऐ
ज़ौक़-ए-तसव्वुर
क्या
कीजे
हम
सूरत-ए-जानाँ
भूल
गए
Asrar Ul Haq Majaz
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छोड़
कर
जाने
का
मंज़र
याद
है
हर
सितम
तेरा
सितमगर
याद
है
अपना
बचपन
भूल
बैठा
हूँ
मगर
अब
भी
तेरा
रोल
नंबर
याद
है
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Salman Zafar
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खिला
कर
भंग
की
गुजिया
समा
रंगीन
कर
दो
तुम
बड़ी
मुश्क़िल
से
तो
हो
पाया
है
दीदार
होली
में
Vijay Anand Mahir
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निगाहों
के
तक़ाज़े
चैन
से
मरने
नहीं
देते
यहाँ
मंज़र
ही
ऐसे
हैं
कि
दिल
भरने
नहीं
देते
हमीं
उन
से
उमीदें
आसमाँ
छूने
की
करते
हैं
हमीं
बच्चों
को
अपने
फ़ैसले
करने
नहीं
देते
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Waseem Barelvi
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कैसे
मंज़र
सामने
आने
लगे
हैं
गाते
गाते
लोग
चिल्लाने
लगे
हैं
Dushyant Kumar
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दो
मुल्कों
के
सियासी
खेल
में
जाने
यहाँ
पर
कितनों
के
घर
उजड़े
हैं
मौला
वही
हर
सुब्ह
मंज़र
देखना
पड़ता
हज़ारों
लोग
यूँँ
ही
मरते
हैं
मौला
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Harsh saxena
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हस्ती
का
नज़ारा
क्या
कहिए
मरता
है
कोई
जीता
है
कोई
जैसे
कि
दिवाली
हो
कि
दिया
जलता
जाए
बुझता
जाए
Nushur Wahidi
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काश
ऐसा
कोई
मंज़र
होता
मेरे
काँधे
पे
तेरा
सर
होता
Tahir Faraz
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मंज़र
बना
हुआ
हूँ
नज़ारे
के
साथ
मैं
कितनी
नज़र
मिलाऊँ
सितारे
के
साथ
मैं
दरिया
से
एक
घूँट
उठाने
के
वास्ते
भागा
हूँ
कितनी
दूर
किनारे
के
साथ
मैं
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Khalid Sajjad
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जिस
शाने
पर
सर
रखते
हो
उस
शाने
पर
सो
जाते
हो
जाने
कैसे
दीदावर
हो
हर
मंज़र
में
खो
जाते
हो
Poonam Yadav
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इक
सदी
की
त्रास
हो
तुम
इक
सदी
की
कल्पना
एक
कवि
का
प्रेम
हो
तुम
एक
कवि
की
वेदना
जीत
कर
प्रभु
युद्ध
को
हर
ली
सिया
की
यातना
किन्तु
लंका
से
है
रघुवर
को
बहुत
संवेदना
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Shubham Rai 'shubh'
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बे-वफ़ा
से
क्या
वफ़ा
करे
कोई
दिल
लगा
के
जब
दग़ा
करे
कोई
नर्क
से
हरगिज़
नहीं
हसद
होगा
दोस्त
ही
जब
डसा
करे
कोई
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Shubham Rai 'shubh'
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पुकारो
न
तुम
आने
वाला
नहीं
हूँ
किसी
को
दिशा
मैं
दिखाता
नहीं
हूँ
ख़ुदा
पर
भरोसा
बहुत
है
मगर
बस
मुक़द्दर
भरोसे
भी
बैठा
नहीं
हूँ
चलेगी
क़लम
चाहे
सर
हो
क़लम
पर
कभी
झूठ
के
दर
पे
ठहरा
नहीं
हूँ
सताने
लगे
जब
ज़माने
के
सच्चे
उसी
दिन
समझना
अकेला
नहीं
हूँ
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Shubham Rai 'shubh'
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कहाँ
अकेले
कोई
राह
चलता
है
कई
निगाहें
उस
के
साथ
चलती
हैं
Shubham Rai 'shubh'
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छुप
के
दीदार
बहुत
करता
है
मुझको
बेज़ार
बहुत
करता
है
प्यार
वो
रात-गए
करता
है
दिन
में
तकरार
बहुत
करता
है
काम
करता
है
सभी
मेरा
पर
पहले
इनकार
बहुत
करता
है
मेरे
झुमके
के
लिए
वो
घर
को
ख़ास-बाज़ार
बहुत
करता
है
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Shubham Rai 'shubh'
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