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Shubham Rai 'shubh'
haal-e-dil bhi bataa nahin sakte
haal-e-dil bhi bataa nahin sakte | हाल-ए-दिल भी बता नहीं सकते
- Shubham Rai 'shubh'
हाल-ए-दिल
भी
बता
नहीं
सकते
दिल
भी
उसका
दुखा
नहीं
सकते
गालों
पे
है
निशान
बोसे
का
साथ
रह
के
मिटा
नहीं
सकते
बज़्म
में
हाथ
थामा
है
उसने
रिश्ता
भी
अब
छुपा
नहीं
सकते
मेरे
हर
बात
पर
वो
लड़ती
है
उस
सेे
सच
सच
बता
नहीं
सकते
धमकी
देती
है
जान
देने
की
हम
उसे
आज़मा
नहीं
सकते
उसने
हमको
दिया
हयात-ए-नौ
हम
वो
क़िस्सा
भुला
नहीं
सकते
- Shubham Rai 'shubh'
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हम
एक
रात
हुए
थे
क़रीब
और
क़रीब
फिर
उसके
बाद
का
क़िस्सा
गुनाह
जैसा
है
Aks samastipuri
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कुछ
न
रह
सका
जहाँ
विरानियाँ
तो
रह
गईं
तुम
चले
गए
तो
क्या
कहानियाँ
तो
रह
गईं
Khalil Ur Rehman Qamar
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क्यूँ
हिज्र
के
सभी
को
क़िस्से
सुना
रहे
हो
ग़म
बेचते
हो
सबको
ग़म
की
दुकान
हो
तुम
Amaan Pathan
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संग-ए-मरमर
की
मूरत
नहीं
आदमी
इस
क़दर
ख़ूब-सूरत
नहीं
आदमी
चंद
क़िस्सों
की
दरकार
है
बस
इसे
आदमी
की
ज़रूरत
नहीं
आदमी
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anupam shah
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हमीं
तक
रह
गया
क़िस्सा
हमारा
किसी
ने
ख़त
नहीं
खोला
हमारा
मु'आफ़ी
और
इतनी
सी
ख़ता
पर
सज़ा
से
काम
चल
जाता
हमारा
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Shariq Kaifi
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हसीं
ख़्वाबों
को
अपने
साथ
में
ढोती
हुई
आंँखे
बहुत
प्यारी
लगी
हमको
तेरी
सोती
हुई
आंँखे
मोहब्बत
में
ये
दो
क़िस्से
सुना
है
रोज़
होते
हैं
कभी
हँसता
हुआ
चेहरा
कभी
रोती
हुई
आंँखे
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Naimish trivedi
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अब
उसकी
शादी
का
क़िस्सा
न
छेड़ो
बस
इतना
कह
दो
कैसी
लग
रही
थी
Zubair Ali Tabish
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तुम्हारे
बिन
गुज़ारी
रात
के
बस
दो
ही
क़िस्से
हैं
कभी
हिचकी
नहीं
रुकती
कभी
सिसकी
नहीं
रुकती
Ankita Singh
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ये
इश्क़-विश्क़
का
क़िस्सा
तमाम
हो
जाए
सफ़ेद
दाढ़ी
हवस
की
गुलाम
हो
जाए
जवान
लड़कियों
बूढ़ों
से
तुम
रहो
हुश्यार
न
जाने
कौन
कहाँ
आसाराम
हो
जाए
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Paplu Lucknawi
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मैं
अगर
अपनी
जवानी
के
सुना
दूँ
क़िस्से
ये
जो
लौंडे
हैं
मेरे
पाँव
दबाने
लग
जाए
Mehshar Afridi
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बिछती
नहीं
पलकें
जहाँ
अपना
तुम्हारा
होता
है
इच्छाएँ
जब
जब
बढ़ती
हैं
तब
तब
ख़सारा
होता
है
Shubham Rai 'shubh'
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किसी
पल
ये
क़िस्मत
बदल
सकती
है
वो
सज-धज
के
घर
से
निकल
सकती
है
लगाना
है
दिल
तो
सँभल
कर
ज़रा
किसी
की
वो
अरमाँ
कुचल
सकती
है
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Shubham Rai 'shubh'
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सुनाते
नहीं
थे
सुनाना
पड़ा
है
उसे
दर्द
मुझको
दिखाना
पड़ा
है
मुहब्बत
सफ़र
है
मुसाफ़िर
हैं
हम
भी
सो
दिल
को
ठिकाना
बनाना
पड़ा
है
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Shubham Rai 'shubh'
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फँसी
कश्ती
हमारी
है
दुखों
का
बोझ
भारी
है
सँभल
कर
चल
रहा
हूँ
जो
दया
गिरधर
तुम्हारी
है
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Shubham Rai 'shubh'
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बे-वफ़ा
से
क्या
वफ़ा
करे
कोई
दिल
लगा
के
जब
दग़ा
करे
कोई
नर्क
से
हरगिज़
नहीं
हसद
होगी
दोस्त
ही
जब
डँसा
करे
कोई
हैं
क़रीबी
मेरे
जान
के
दुश्मन
जीते
जी
मेरी
'अज़ा
करे
कोई
मुँह
लगाया
बारी
बारी
से
उसने
होंट
को
उसके
सफ़ा
करे
कोई
दोस्ती
में
ही
दग़ा
किया
सबने
सामने
आकर
जफ़ा
करे
कोई
कोसते
है,
देख
के
तरक़्क़ी
अब
मेरे
हिस्से
में
दु'आ
करे
कोई
शुभ
घड़ी
को
बार
बार
मत
देखो,
अब
नहीं
है
वक़्त
क्या
करे
कोई
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Shubham Rai 'shubh'
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