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Sabir Hussain
ham jo the kabhi sikandar apni duniya ke
ham jo the kabhi sikandar apni duniya ke | हम जो थे कभी सिकंदर अपनी दुनिया के
- Sabir Hussain
हम
जो
थे
कभी
सिकंदर
अपनी
दुनिया
के
उनके
हाथों
का
खिलौना
बन
कर
रह
गए
- Sabir Hussain
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मैं
तेरी
गोद
में
कैसा
लगा
था
माँ
तेरा
तो
दूसरा
बचपन
हुआ
था
मैं
Rohit tewatia 'Ishq'
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बूढ़ी
माँ
का
शायद
लौट
आया
बचपन
गुड़ियों
का
अम्बार
लगा
कर
बैठ
गई
Irshad Khan Sikandar
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आज
फिर
माँ
मुझे
मारेगी
बहुत
रोने
पर
आज
फिर
गाँव
में
आया
है
खिलौने
वाला
Nawaz Zafar
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मिरी
जो
शख़्सियत
है
उसको
माँ
ने
ही
तराशा
है
मिरा
बचपन
जहाँ
बीता
था
उस
घर
का
किराया
हूँ
Amaan Pathan
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बचपन
से
ख़ुद
पे
दाँव
लगाते
रहे
हैं
हम
सीखी
है
खेल
खेल
में
हमने
शनावरी
Ajeetendra Aazi Tamaam
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बच्चों
के
हाथों
में
रख
दी
अय्यारी
टॉफी
के
बदले
देखो
मेरा
ही
ख़ूँ
अब
मुझको
छलता
है
धीरे-धीरे
Tarun Pandey
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मुहब्बत
दुसरी
कोशिश
में
पहली
मर्तबा
होगी
वही
स्कूल
की
लड़की
मेरे
कॉलेज
में
आई
है
Nasir khan 'Nasir'
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बचपन
कितना
प्यारा
था
जब
दिल
को
यक़ीं
आ
जाता
था
मरते
हैं
तो
बन
जाते
हैं
आसमान
के
तारे
लोग
Azra Naqvi
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क्या
सितम
करते
हैं
मिट्टी
के
खिलौने
वाले
राम
को
रक्खे
हुए
बैठे
हैं
रावण
के
क़रीब
Asghar Mehdi Hosh
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मैं
बचपन
में
खिलौने
तोड़ता
था
मिरे
अंजाम
की
वो
इब्तिदा
थी
Javed Akhtar
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फ़र्त-ए-ख़ुशी
से
अपनी
जो
भी
रश्क
करते
हैं
उनको
तिरी
बनाई
वो
जन्नत
तलब
नहीं
Sabir Hussain
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इक
ओर
वो
सलीके
से
काटे
हैं
सर
मिरा
इक
ओर
मैं
कसीदे
पढूँ
शान-ए-यार
में
हरगिज़
नहीं
बनाता
मोहब्बत
में
हिज्र
मैं
होता
अगर
बनाना
मेरे
इख़्तियार
में
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Sabir Hussain
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हमको
किसी
से
अब
भी
मोहब्बत
तलब
नहीं
इज़्ज़त
तलब
तो
है
पर
अक़ीदत
तलब
नहीं
इतना
हसीन
हैं
वो
तख़य्युल
कि
क्या
कहें
बस
इतना
जान
लो
की
हक़ीक़त
तलब
नहीं
फ़र्त-ए-ख़ुशी
से
अपनी
जो
भी
रश्क
करते
हैं
उनको
तिरी
बनाई
वो
जन्नत
तलब
नहीं
बस
ख़ुद-कुशी
से
बचने
का
ज़रिया
है
शा'इरी
हमको
सुख़न-वरी
से
तो
शोहरत
तलब
नहीं
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Sabir Hussain
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करना
गर
पड़े
बे-पर्दा
हमें
उसे
साबिर
हम
तो
ऐसी
शोहरत
से
दरकिनार
करते
हैं
Sabir Hussain
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नक़्श-ए-क़दम
को
मान
के
सच
हम
जो
चल
दिए
फिर
आ
गए
वहीं
पे
चले
थे
जहाँ
से
हम
Sabir Hussain
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