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ZARKHEZ
aap kii mehfil men sab the KHaamushi pahne hue
aap kii mehfil men sab the KHaamushi pahne hue | आप की महफ़िल में सब थे ख़ामुशी पहने हुए
- ZARKHEZ
आप
की
महफ़िल
में
सब
थे
ख़ामुशी
पहने
हुए
मेरे
आते
ही
तमाशा-गर
तमाशा
किस
लिए
- ZARKHEZ
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वो
एक
लम्हा
जो
बेदारियों
का
ज़ामिन
है
जब
आँख
लगने
लगे
तब
अज़ान
देता
है
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अगर
ज़ाहिर
करूँँगा
आसमाँ
पर
ख़्वाहिशें
अपनी
मुझे
इस
बात
का
डर
है
सितारे
टूट
जाएँगे
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तू
भी
गर
बे-वफ़ाई
कर
जाए
तो
मेरा
क़र्ज़
ही
उतर
जाए
ख़ुद-कुशी
की
सहूलतें
तब
हैं
जब
कोई
हादसा
गुज़र
जाए
ज़िन्दगी
एक
शाहज़ादी
है
शाहज़ादी
का
दिल
न
भर
जाए
मैं
अगर
ज़ब्त
करने
पर
आऊँ
तिश्नगी
तिश्नगी
से
मर
जाए
वस्ल
उस
कैफ़ियत
में
लाज़िम
है
जब
हवस
का
नशा
उतर
जाए
या
उभर
आए
आज
वो
सूरत
या
मेरे
हाथ
से
हुनर
जाए
फिर
किसी
हुस्न
की
इनायत
हो
फिर
कोई
सानेहा
गुज़र
जाए
हसरतों
से
छलक
रहा
है
दिल
कोई
ये
जाम
ख़ाली
कर
जाए
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आ
रहा
है
बहार
का
मौसम
फूल
निकलेंगे
मेरे
ज़ख़्मों
से
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क़दम
बढ़ाए
गए
जब
भी
ज़िंदगी
की
तरफ़
किसी
ने
खींच
लिया
हमको
शा'इरी
की
तरफ़
ये
लोग
आपको
ज़िंदा
जला
भी
सकते
हैं
अगरचे
बढ़ते
रहे
यूँँ
ही
रौशनी
की
तरफ़
कोई
सदा
भी
मेरे
कान
तक
न
पहुँचेगी
पहुँच
गया
मैं
अगर
अपनी
ख़ामुशी
की
तरफ़
हर
इक
ख़याल
से
आया
मुझे
ख़याल
तेरा
हर
इक
गली
से
मैं
पहुँचा
तेरी
गली
की
तरफ़
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