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ZARKHEZ
tu bhi gar be-vafaaii kar jaa.e
tu bhi gar be-vafaaii kar jaa.e | तू भी गर बे-वफ़ाई कर जाए
- ZARKHEZ
तू
भी
गर
बे-वफ़ाई
कर
जाए
तो
मेरा
क़र्ज़
ही
उतर
जाए
ख़ुद-कुशी
की
सहूलतें
तब
हैं
जब
कोई
हादसा
गुज़र
जाए
ज़िन्दगी
एक
शाहज़ादी
है
शाहज़ादी
का
दिल
न
भर
जाए
मैं
अगर
ज़ब्त
करने
पर
आऊँ
तिश्नगी
तिश्नगी
से
मर
जाए
वस्ल
उस
कैफ़ियत
में
लाज़िम
है
जब
हवस
का
नशा
उतर
जाए
या
उभर
आए
आज
वो
सूरत
या
मेरे
हाथ
से
हुनर
जाए
फिर
किसी
हुस्न
की
इनायत
हो
फिर
कोई
सानेहा
गुज़र
जाए
हसरतों
से
छलक
रहा
है
दिल
कोई
ये
जाम
ख़ाली
कर
जाए
- ZARKHEZ
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जो
राहबर
रहे
हैं
गुमराह
कर
रहे
हैं
ये
वक़्त
मुंजमिद
है
और
हम
गुज़र
रहे
हैं
हम
अपना
ही
असासा
छूने
से
डर
रहे
हैं
कुछ
कर
मिरे
मसीहा
ये
ज़ख़्म
भर
रहे
हैं
तालीम-याफ़्ता
अब
जेबें
कतर
रहे
हैं
बा-मौत
मरने
वाले
बे-मौत
मर
रहे
हैं
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रौशनी
चुरा
ली
है
जेब
में
छुपा
ली
है
आज
सुब्ह
उठते
ही
नींद
की
दवा
ली
है
ऐ
ज़मीन
ऊपर
उठ
आसमान
ख़ाली
है
मैंने
उन
निगाहों
से
फिर
शिकस्त
खा
ली
है
उस
ने
मेरी
ख़ुशबू
आज
जिस्म
पर
लगा
ली
है
ख़ामुशी
के
हल्के
में
शोर
ने
जगा
ली
है
मज्लिसी
तबस्सुम
ने
आबरू
बचा
ली
है
इस
दफ़ा
दिवाली
पर
आरज़ू
जला
ली
है
ज़िंदगी
चराग़ों
की
रात
ने
बिता
ली
है
तू
ने
मेरी
ख़ामोशी
दिल
से
क्यूँ
लगा
ली
है
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वो
एक
लम्हा
जो
बेदारियों
का
ज़ामिन
है
जब
आँख
लगने
लगे
तब
अज़ान
देता
है
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आइना
उसने
तोड़
फेंका
है
मेरी
आँखों
में
काँच
बिखरा
है
मैं
तेरे
लब
तो
चूम
लेता
हूँ
फिर
मेरे
लब
से
ख़ून
बहता
है
बंद
कर
के
तमाम
दरवाज़े
तेरी
ख़ुशबू
को
रोक
रक्खा
है
मैं
यहाँ
बस्तियों
में
तन्हा
हूँ
दश्त
भी
दश्त
में
अकेला
है
जिस
जगह
तुमने
हाथ
छोड़ा
था
दिल
उसी
बाग़
में
टहलता
है
मेरी
हद
थी
फ़क़त
दरीचों
तक
मेरा
बचपन
ख़राब
गुज़रा
है
फिर
तो
जलना
भी
लाज़िमी
होगा
गर
तुझे
तीरगी
निगलना
है
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आप
की
महफ़िल
में
सब
थे
ख़ामुशी
पहने
हुए
मेरे
आते
ही
तमाशा-गर
तमाशा
किस
लिए
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