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raushni chura li hai
raushni chura li hai | रौशनी चुरा ली है
- ZARKHEZ
रौशनी
चुरा
ली
है
जेब
में
छुपा
ली
है
आज
सुब्ह
उठते
ही
नींद
की
दवा
ली
है
ऐ
ज़मीन
ऊपर
उठ
आसमान
ख़ाली
है
मैंने
उन
निगाहों
से
फिर
शिकस्त
खा
ली
है
उस
ने
मेरी
ख़ुशबू
आज
जिस्म
पर
लगा
ली
है
ख़ामुशी
के
हल्के
में
शोर
ने
जगा
ली
है
मज्लिसी
तबस्सुम
ने
आबरू
बचा
ली
है
इस
दफ़ा
दिवाली
पर
आरज़ू
जला
ली
है
ज़िंदगी
चराग़ों
की
रात
ने
बिता
ली
है
तू
ने
मेरी
ख़ामोशी
दिल
से
क्यूँ
लगा
ली
है
- ZARKHEZ
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रात
ढलने
वाली
है
आँख
लगने
वाली
है
इक
दरख़्त
के
नीचे
धूप
पलने
वाली
है
अब्र
छाने
वाला
है
ख़ाक
उड़ने
वाली
है
आज
एक
दरिया
में
आग
लगने
वाली
है
बाग़
में
ख़िज़ाँ
आ
कर
फूल
चुनने
वाली
है
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सैकड़ों
मील
की
थकन
जैसे
नीम
की
छाँव
से
चली
जाए
लाख
शिकवे
गिले
थे
दुनिया
से
फिर
मेरी
ज़िंदगी
में
तुम
आए
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इस
जहाँ
के
सारे
मंज़र
उसकी
आँखों
से
छुए
उसने
नज़रें
फेर
लीं
तो
मैं
भी
अंधा
हो
गया
धीरे
धीरे
हो
गई
मसरूफ़
अपनी
ज़िंदगी
रफ़्ता
रफ़्ता
आशिक़ी
का
शौक़
पूरा
हो
गया
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आ
रहा
है
बहार
का
मौसम
फूल
निकलेंगे
मेरे
ज़ख़्मों
से
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मैं
अपने
घर
के
सभी
रास्तों
को
भूल
गया
तेरे
बदन
का
हर
इक
तिल
शुमार
करते
हुए
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