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jab hawa tez-tez chalti thii
jab hawa tez-tez chalti thii | जब हवा तेज़-तेज़ चलती थी
- ZARKHEZ
जब
हवा
तेज़-तेज़
चलती
थी
मेरे
अंदर
उमीद
जलती
थी
जान
पड़
जाती
ख़ुश्क
दरिया
में
बर्फ़
पर्वत
की
जब
पिघलती
थी
तब
तअक़्क़ुब
में
साए
होते
थे
जब
कभी
रौशनी
निकलती
थी
चाँद
सोता
था
ओढ़
कर
बादल
चाँदनी
करवटें
बदलती
थी
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रौशनी
चुरा
ली
है
जेब
में
छुपा
ली
है
आज
सुब्ह
उठते
ही
नींद
की
दवा
ली
है
ऐ
ज़मीन
ऊपर
उठ
आसमान
ख़ाली
है
मैंने
उन
निगाहों
से
फिर
शिकस्त
खा
ली
है
उस
ने
मेरी
ख़ुशबू
आज
जिस्म
पर
लगा
ली
है
ख़ामुशी
के
हल्के
में
शोर
ने
जगा
ली
है
मज्लिसी
तबस्सुम
ने
आबरू
बचा
ली
है
इस
दफ़ा
दिवाली
पर
आरज़ू
जला
ली
है
ज़िंदगी
चराग़ों
की
रात
ने
बिता
ली
है
तू
ने
मेरी
ख़ामोशी
दिल
से
क्यूँ
लगा
ली
है
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हर
एक
सम्त
से
देखूँ
तुम्हें
किसे
मालूम
उदासियों
का
नया
ज़ाविया
निकल
आए
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आइना
उसने
तोड़
फेंका
है
मेरी
आँखों
में
काँच
बिखरा
है
मैं
तेरे
लब
तो
चूम
लेता
हूँ
फिर
मेरे
लब
से
ख़ून
बहता
है
बंद
कर
के
तमाम
दरवाज़े
तेरी
ख़ुशबू
को
रोक
रक्खा
है
मैं
यहाँ
बस्तियों
में
तन्हा
हूँ
दश्त
भी
दश्त
में
अकेला
है
जिस
जगह
तुमने
हाथ
छोड़ा
था
दिल
उसी
बाग़
में
टहलता
है
मेरी
हद
थी
फ़क़त
दरीचों
तक
मेरा
बचपन
ख़राब
गुज़रा
है
फिर
तो
जलना
भी
लाज़िमी
होगा
गर
तुझे
तीरगी
निगलना
है
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रात
ढलने
वाली
है
आँख
लगने
वाली
है
इक
दरख़्त
के
नीचे
धूप
पलने
वाली
है
अब्र
छाने
वाला
है
ख़ाक
उड़ने
वाली
है
आज
एक
दरिया
में
आग
लगने
वाली
है
बाग़
में
ख़िज़ाँ
आ
कर
फूल
चुनने
वाली
है
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इस
जहाँ
के
सारे
मंज़र
उसकी
आँखों
से
छुए
उसने
नज़रें
फेर
लीं
तो
मैं
भी
अंधा
हो
गया
धीरे
धीरे
हो
गई
मसरूफ़
अपनी
ज़िंदगी
रफ़्ता
रफ़्ता
आशिक़ी
का
शौक़
पूरा
हो
गया
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