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har ek samt se dekhooñ tumhein kise maaloom
har ek samt se dekhooñ tumhein kise maaloom | हर एक सम्त से देखूँ तुम्हें किसे मालूम
- ZARKHEZ
हर
एक
सम्त
से
देखूँ
तुम्हें
किसे
मालूम
उदासियों
का
नया
ज़ाविया
निकल
आए
- ZARKHEZ
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सैकड़ों
मील
की
थकन
जैसे
नीम
की
छाँव
से
चली
जाए
लाख
शिकवे
गिले
थे
दुनिया
से
फिर
मेरी
ज़िंदगी
में
तुम
आए
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अगर
तुम
पर
जुनूँ
तारी
नहीं
है
तुम्हारा
इश्क़
मेयारी
नहीं
है
अभी
बंद-ए-क़बा
मत
खोल
अपने
मेरी
आँखों
की
तैयारी
नहीं
है
तेरे
नख़रे
उठाए
तो
ये
जाना
ये
दुनिया
इस
क़दर
भारी
नहीं
है
वो
गहरे
ख़्वाब
में
डूबे
हुए
हैं
जिन्हें
सोने
की
बीमारी
नहीं
है
मोहब्बत
कर
रहे
हैं
हम
कि
हम
में
बहुत
ज़्यादा
समझदारी
नहीं
है
हमारे
ख़्वाब
टूटे
जा
रहे
हैं
मगर
आँखों
में
बेदारी
नहीं
है
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रौशनी
चुरा
ली
है
जेब
में
छुपा
ली
है
आज
सुब्ह
उठते
ही
नींद
की
दवा
ली
है
ऐ
ज़मीन
ऊपर
उठ
आसमान
ख़ाली
है
मैंने
उन
निगाहों
से
फिर
शिकस्त
खा
ली
है
उस
ने
मेरी
ख़ुशबू
आज
जिस्म
पर
लगा
ली
है
ख़ामुशी
के
हल्के
में
शोर
ने
जगा
ली
है
मज्लिसी
तबस्सुम
ने
आबरू
बचा
ली
है
इस
दफ़ा
दिवाली
पर
आरज़ू
जला
ली
है
ज़िंदगी
चराग़ों
की
रात
ने
बिता
ली
है
तू
ने
मेरी
ख़ामोशी
दिल
से
क्यूँ
लगा
ली
है
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जो
हर्फ़
हर्फ़
जोड़
के
लिखता
रहा
मुझे
उसने
भी
इक
किताब
में
दफ़्ना
दिया
मुझे
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उन
दरख़्तों
से
दूर
हो
जाओ
जिन
दरख़्तों
में
छाँव
होती
है
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