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Karan Shukla
kisi ko ab kisi se vaasta kya
kisi ko ab kisi se vaasta kya | किसी को अब किसी से वास्ता क्या
- Karan Shukla
किसी
को
अब
किसी
से
वास्ता
क्या
मिलो
तो
ठीक
वरना
आपका
क्या
किया
जब
वार
उसने
लब
पे
लब
थे
सुकूँ
था
इतना
सो
मैं
चीख़ता
क्या
बचे
हैं
जान
से
हम
जाते
जाते
दिवाना
यार
कहता
है
किया
क्या
जो
पूछा
है
तू
बस
उतना
बता
दे
उसे
ख़ुदस
भी
ज़्यादा
चाहता
क्या
बड़ी
ख़ामोशी
बिखरी
है
गली
में
वो
लड़का
कमरा
ख़ाली
कर
गया
क्या
तू
फिर
घुटकर
मरेगी
प्यारी
बेटी
अगर
सोचा
ज़माना
सोचता
क्या
‘करन’
ताला
लगा
है
उस
बदन
पे
किसी
का
हो
गया
क़ब्ज़ा
भला
क्या
- Karan Shukla
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तलाश
हम
को
किसी
भी
बदन
की
है
ही
नहीं
हवस
की
भूख
हमारे
ज़ेहन
की
है
ही
नहीं
किसी
से
बिछड़े
तो
कोई
फ़ना
नहीं
होता
क़ज़ा
की
बात
तो
अब
के
ज़मन
की
है
ही
नहीं
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Shadab Asghar
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कभी
देखा
नहीं
जिसने
बदन
के
आगे
कुछ
भी
भला
वो
क्यूँ
मुहब्बत
जावेदाना
ढूँढता
है
Chandan Sharma
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दिसंबर
की
सर्दी
है
उसके
ही
जैसी
ज़रा
सा
जो
छू
ले
बदन
काँपता
है
Amit Sharma Meet
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वक़्त-ए-रुख़्सत
आब-दीदा
आप
क्यूँँ
हैं
जिस्म
से
तो
जाँ
हमारी
जा
रही
है
Azm Shakri
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ये
जिस्म
तंग
है
सीने
में
भी
लहू
कम
है
दिल
अब
वो
फूल
है
जिस
में
कि
रंग-ओ-बू
कम
है
Pallav Mishra
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तुमने
कैसे
उसके
जिस्म
की
ख़ुशबू
से
इनकार
किया
उस
पर
पानी
फेंक
के
देखो
कच्ची
मिट्टी
जैसा
है
Tehzeeb Hafi
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उसके
बदन
को
दी
नुमूद
हमने
सुखन
में
और
फिर
उसके
बदन
के
वास्ते
इक
क़बा़
भी
सी
गई
Jaun Elia
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हवा
चली
तो
उसकी
शॉल
मेरी
छत
पे
आ
गिरी
ये
उस
बदन
के
साथ
मेरा
पहला
राब्ता
हुआ
Zia Mazkoor
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टूटा
तो
हूँ
मगर
अभी
बिखरा
नहीं
'फ़राज़'
मेरे
बदन
पे
जैसे
शिकस्तों
का
जाल
हो
Ahmad Faraz
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मुझको
बदन
नसीब
था
पर
रूह
के
बग़ैर
उसने
दिया
भी
फूल
तो
ख़ुशबू
निकाल
कर
Ankit Maurya
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गली
तक
बस
मुझे
जाना
पड़ेगा
उसे
फिर
छत
पे
तो
आना
पड़ेगा
खिलाऊँगी
जो
अपने
हाथ
से
मैं
तो
उसको
ज़हर
भी
खाना
पड़ेगा
मकाँ
ख़ाली
गई
करके
वो
दिल
का
सो
इक
और
लड़की
को
लाना
पड़ेगा
ये
दिल
का
बोझ
कम
करने
को
साथी
तराना
तो
कोई
गाना
पड़ेगा
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Karan Shukla
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हमारी
ही
खिंचाई
पे
उतर
आए
सभी
अपने
बुराई
पे
उतर
आए
पिता
का
बोझ
कम
करने
को
ये
लड़के
बहुत
जल्दी
कमाई
पे
उतर
आए
जो
भागे
थे
घरों
से
इश्क़
करने
को
वो
सब
इक
दिन
जुदाई
पे
उतर
आए
ग़ज़ब
है
बात
जब
पकड़ी
गई
उनकी
तो
फ़ौरन
फिर
सफ़ाई
पे
उतर
आए
जो
अपने
ख़ून
से
सींचे
कभी
हमने
वही
रिश्ते
लड़ाई
पे
उतर
आए
वफ़ा
में
धोके
खाते
खाते
इक
दिन
हम
यहाँ
फिर
बे-वफ़ाई
पे
उतर
आए
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Karan Shukla
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तुमपे
मरने
की
हद
है
कुछ
भी
करने
की
हद
है
कब
तक
झेले
तुझको
हम
अब
दिल
भरने
की
हद
है
उनकी
इज़्ज़त
रखने
को
चुप
भी
करने
की
हद
है
छिपकली
हो
या
जानाँ
कुछ
इनसे
डरने
की
हद
है
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Karan Shukla
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कमी
कैसी
मिरे
अंदर
गया
तू
छोड़
कर
अपनी
कि
अब
तेरी
कमी
को
जाने
कितने
लोग
भरते
हैं
Karan Shukla
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बहुत
सोच
के
फ़ैसला
कर
लिया
अलग
सब
सेे
अब
रास्ता
कर
लिया
वही
ढंग
है
आज
भी
जीने
का
तिरी
याद
आई
नशा
कर
लिया
नए
इश्क़
में
उसके
दिक़्क़त
न
हो
सो
हमने
ज़रा
फ़ासला
कर
लिया
सही
राय
देंगे
मुझे
आप
लोग
यही
सोच
के
राब्ता
कर
लिया
गले
से
लिपटकर
ये
कहती
है
वो
ये
कब
हिज्र
का
फ़ैसला
कर
लिया
अकेले
उठाओ
ये
ज़ख़्मी
बदन
कि
अब
सबने
तो
फ़ासला
कर
लिया
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Karan Shukla
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