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Vishakt ki Kalam se
ha
ha | हमें तो जान से ही हाथ धोना पड़ गया था
- Vishakt ki Kalam se
हमें
तो
जान
से
ही
हाथ
धोना
पड़
गया
था
उसे
क़ातिल
कहेंगे
लोग
तो
ज़िंदा
हुए
हैं
- Vishakt ki Kalam se
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मैं
होश-मंद
हूँ
ख़ुद
भी
सो
मेरी
ग़ज़लों
में
न
रक़्स
करता
है
'आशिक़
न
बाल
खींचता
है
Charagh Sharma
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इक
ये
भी
तो
अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ
है
ऐ
चारागरो
दर्द
बढ़ा
क्यूँँ
नहीं
देते
Ahmad Faraz
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बहुत
पहले
से
उन
क़दमों
की
आहट
जान
लेते
हैं
तुझे
ऐ
ज़िंदगी
हम
दूर
से
पहचान
लेते
हैं
Firaq Gorakhpuri
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अजीब
हालत
है
जिस्म-ओ-जाँ
की
हज़ार
पहलू
बदल
रहा
हूँ
वो
मेरे
अंदर
उतर
गया
है
मैं
ख़ुद
से
बाहर
निकल
रहा
हूँ
Azm Shakri
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इतनी
मिलती
है
मिरी
ग़ज़लों
से
सूरत
तेरी
लोग
तुझ
को
मिरा
महबूब
समझते
होंगे
Bashir Badr
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रहते
थे
कभी
जिन
के
दिल
में
हम
जान
से
भी
प्यारों
की
तरह
बैठे
हैं
उन्हीं
के
कूचे
में
हम
आज
गुनहगारों
की
तरह
Majrooh Sultanpuri
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ज़्यादा
मीठा
हो
तो
चींटा
लग
जाता
है
सच्चे
इश्क़
को
अक्सर
बट्टा
लग
जाता
है
हमने
अपनी
जान
गंवाई
तब
जाना
भाव
मिले
तो
कुछ
भी
सट्टा
लग
जाता
है
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Ritesh Rajwada
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गर
उदासी,
चिड़चिड़ापन,
जान
देना
प्यार
है
माफ़
करना,
काम
मुझको
और
भी
हैं
दोस्तो
Divy Kamaldhwaj
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ये
हक़ीक़त
है,
मज़हका
नहीं
है
वो
बहुत
दूर
है,
जुदा
नहीं
है
तेरे
होंटों
पे
रक़्स
करता
है
राज़
जो
अब
तलक
खुला
नहीं
है
जान
ए
जांँ
तेरे
हुस्न
के
आगे
ये
जो
शीशा
है,
आइना
नहीं
है
क्यूँ
शराबोर
हो
पसीने
में
मैं
ने
बोसा
अभी
लिया
नहीं
है
उस
का
पिंदार
भी
वहीं
का
वहीं
मेरे
लब
पर
भी
इल्तेजा
नहीं
है
जो
भी
होना
था
हो
चुका
काज़िम
अब
किसी
से
हमें
गिला
नहीं
है
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Kazim Rizvi
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कहाँ
तक
साथ
दोगी
तुम
हमारा
सनम
जावेदाँ
है
यह
ग़म
हमारा
Avtar Singh Jasser
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शाप
ये
मैं
जी
रहा
हूँ
ज़हर
को
मैं
पी
रहा
हूँ
कौन
ख़ुश
हैं
ज़िंदगी
से
रोज़
आँखें
सी
रहा
हूँ
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Vishakt ki Kalam se
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किसी
इक
रोज़
तुम
अफ़सोस
मेरा
भी
करोगे
कभी
तुम
भी
लिखोगे
नाम
मेरा
शा'इरी
में
Vishakt ki Kalam se
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भुजाओं
की
दिखा
ताक़त
दिखा
दे
कौन
है
तू
ग़लत
तो
है
ज़माना
ये
मगर
क्यूँ
मौन
है
तू
Vishakt ki Kalam se
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मुझे
लड़ते
नहीं
देखा
न
मेरी
मार
देखी
है
ज़रा
पूछो
उन्हें
जा
कर
जिन्होंने
हार
देखी
है
Vishakt ki Kalam se
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भरोसा
कर
लिया
आँखें
न
खोली
यही
इक
बात
मैंने
मन
से
बोली
Vishakt ki Kalam se
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