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Vishakt ki Kalam se
ha
ha | हमें बेरोज़गारी खा रही है
- Vishakt ki Kalam se
हमें
बेरोज़गारी
खा
रही
है
घुटन
ये
रोज़
बढ़ती
जा
रही
है
परेशानी
हमारी
अब
न
पूछो
समाधानों
की
अर्थी
जा
रही
है
किसी
को
नौकरी
मिलती
नहीं
है
है
जिनके
पास
उनकी
जा
रही
है
किसी
की
आस
है
सब
ठीक
होगा
किसी
की
साँस
रुकती
जा
रही
है
मदद
की
दूर
तक
आशा
नहीं
है
निराशा
और
बढ़ती
जा
रही
है
पढ़े
थे
और
कुछ
पर
काम
कुछ
है
पढ़ाई
काम
किस
के
आ
रही
है
बिकाऊ
हो
गई
है
अब
जवानी
बुढ़ापे
की
तरफ़
को
जा
रही
है
- Vishakt ki Kalam se
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किसी
को
खेलनी
है
साथ
तेरे
रंग
की
होली
कहीं
पर
खेलते
हैं
साथ
तेरे
भंग
की
होली
नहीं
मैं
जानता
खेलूँ
कहाँ
किस
ढंग
की
होली
मुझे
है
चाह
खेलूँ
संग
तेरे
शंग
की
होली
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उदासी
को
छिपाना
जानता
हूँ
कभी
रोया
नहीं
मैं
भी
अभी
तक
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बनो
बादल
कभी
तुम
भी
भिगाओ
रूह
को
मेरी
सुनाओ
गीत
तुम
अपने
सुनो
तुम
रागिनी
मेरी
कभी
मौक़ा
मुझे
भी
दो
मुझे
भी
है
तलब
तेरी
तुझे
चाहा
न
बस
मैंने
तू
ही
है
आरज़ू
मेरी
मुझे
तेरी
ज़रूरत
है
तुझे
भी
चाह
हो
मेरी
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हमें
तो
जान
से
ही
हाथ
धोना
पड़
गया
था
उसे
क़ातिल
कहेंगे
लोग
तो
ज़िंदा
हुए
हैं
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मुझे
'आशिक़
न
समझो
तुम
नहीं
मैं
ज़ाहिरी
तेरा
पता
ये
ही
नहीं
दिन
कौन
सा
है
आख़िरी
मेरा
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