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Gulshan
suno rona to main bhi chahta hooñ
suno rona to main bhi chahta hooñ | सुनो रोना तो मैं भी चाहता हूँ
- Gulshan
सुनो
रोना
तो
मैं
भी
चाहता
हूँ
इस
में
तौहीन
मेरी
जात
की
है
- Gulshan
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मैं
तमाम
दिन
का
थका
हुआ
तू
तमाम
शब
का
जगा
हुआ
ज़रा
ठहर
जा
इसी
मोड़
पर
तेरे
साथ
शाम
गुज़ार
लूँ
Bashir Badr
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मुझ
को
बीमार
करेगी
तिरी
आदत
इक
दिन
और
फिर
तुझ
से
भी
अच्छा
नहीं
हो
पाऊँगा
Rahul Jha
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तुम
भी
लिखना
तुम
ने
उस
शब
कितनी
बार
पिया
पानी
तुम
ने
भी
तो
छज्जे
ऊपर
देखा
होगा
पूरा
चाँद
Nida Fazli
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सर-ज़मीन-ए-हिंद
पर
अक़्वाम-ए-आलम
के
'फ़िराक़'
क़ाफ़िले
बसते
गए
हिन्दोस्ताँ
बनता
गया
Firaq Gorakhpuri
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मैं
तो
मुद्दत
से
ग़ैर-हाज़िर
हूँ
बस
मेरा
नाम
है
रजिस्टर
में
याद
करती
हैं
तुझको
दीवारें
शक्ल
उभर
आई
है
पलस्तर
में
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Azhar Nawaz
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इक
रोज़
इक
नदी
के
किनारे
मिलेंगे
हम
इक
दूसरे
से
अपना
पता
पूछते
हुए
Shahbaz Rizvi
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ये
आग
वाग
का
दरिया
तो
खेल
था
हम
को
जो
सच
कहें
तो
बड़ा
इम्तिहान
आँसू
हैं
Abhishek shukla
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बाग़बाँ
हम
तो
इस
ख़याल
के
हैं
देख
लो
फूल
फूल
तोड़ो
मत
Jaun Elia
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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ये
काम
दोनों
तरफ़
हुआ
है
उसे
भी
आदत
पड़ी
है
मेरी
Shariq Kaifi
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मुझे
भी
इतनी
अब
फुर्सत
नहीं
बची
उसे
पाने
की
अब
हसरत
नहीं
बची
Gulshan
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तुझे
पाकर
ज़माने
की
वफ़ा
अच्छी
नहीं
लगती
सिवा
तेरे
किसी
की
भी
अदा
अच्छी
नहीं
लगती
Gulshan
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दिल
की
हस्ती
मिटाता
जा
रहा
हूँ
उसकी
यादें
भुलाता
जा
रहा
हूँ
Gulshan
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दुखों
को
सुख
बताया
जा
रहा
है
यूँँ
रोते
को
हँसाया
जा
रहा
है
दुखी
लाचार
बेबस
लोग
हैं
जो
उन्हें
बेहद
सताया
जा
रहा
है
जहाँ
पर
बाँटते
हैं
दर्द
काँटे
वहाँ
पर
गुल
खिलाया
जा
रहा
है
उजाले
के
लिए
दीपक
जलाकर
अँधेरे
को
मिटाया
जा
रहा
है
मिले
थे
ज़ख़्म
जिसके
प्यार
में
ये
उसे
दिल
में
बसाया
जा
रहा
है
हटाने
थे
सभी
सन्देह
'गुलशन'
भरोसा
क्यूँ
उठाया
जा
रहा
है
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Gulshan
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दर्द
जब
हद
से
गुज़र
जाता
है
वो
मुझे
याद
बहुत
आता
है
Gulshan
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