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Tiwari Jitendra
dard dekar door j
dard dekar door j | दर्द देकर दूर जाना ठीक है
- Tiwari Jitendra
दर्द
देकर
दूर
जाना
ठीक
है
झूठ
के
आँसू
बहाना
ठीक
है
गाँव
आना
जब
कभी
दहलीज़
पर
देख
मुझको
लौट
जाना
ठीक
है
वो
कभी
दिल
जान
से
प्यारा
रहा
अब
उसी
का
दिल
दुखाना
ठीक
है
प्यार
मेरा
जिस्म
पे
क्यूँ
जा
टिके
चूम
कर
तस्वीर
आना
ठीक
है
ख़ुद-कुशी
से
लोग
मरते
है
यहाँ
लोग
कहते
है
ज़माना
ठीक
है
तुम
तिवारी
लौट
जाओ
नींद
में
ख़्वाब
में
उसका
सताना
ठीक
है
- Tiwari Jitendra
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हम
कुछ
ऐसे
उसके
आगे
अपनी
वफ़ा
रख
देते
हैं
बच्चे
जैसे
रेल
की
पटरी
पर
सिक्का
रख
देते
हैं
तस्वीर-ए-ग़म,
दिल
के
आँसू,
रंजो-नदामत,
तन्हाई
उसको
ख़त
लिखते
हैं
ख़त
में
हम
क्या
क्या
रख
देते
हैं
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Subhan Asad
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आँसू
आँसू
जिस
ने
दरिया
पार
किए
क़तरा
क़तरा
आब
में
उलझा
बैठा
है
Mashkoor Husain Yaad
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कुछ
ख़ुशियाँ
कुछ
आँसू
दे
कर
टाल
गया
जीवन
का
इक
और
सुनहरा
साल
गया
Unknown
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अपनी
कि़स्मत
में
ही
जब
इश्क़
नहीं
है
यारो
किसलिए
अश्क-ए-लहू
इश्क़
में
जाया
करना
Ajeetendra Aazi Tamaam
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गर्म
आँसू
और
ठंडी
आहें
मन
में
क्या
क्या
मौसम
हैं
इस
बग़िया
के
भेद
न
खोलो
सैर
करो
ख़ामोश
रहो
Ibn E Insha
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जैसे
पतवार
सफ़ीने
के
लिए
होते
हैं
दोस्त
अहबाब
तो
जीने
के
लिए
होते
हैं
इश्क़
में
कोई
तमाशा
नहीं
करना
होता
अश्क
जैसे
भी
हों
पीने
के
लिए
होते
हैं
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Khalid Nadeem Shani
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क्या
दुख
है
समुंदर
को
बता
भी
नहीं
सकता
आँसू
की
तरह
आँख
तक
आ
भी
नहीं
सकता
तू
छोड़
रहा
है
तो
ख़ता
इस
में
तेरी
क्या
हर
शख़्स
मेरा
साथ
निभा
भी
नहीं
सकता
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Waseem Barelvi
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न
खाओ
क़स
में
वग़ैरा
न
अश्क
ज़ाया'
करो
तुम्हें
पता
है
मेरी
जान
हक़-पज़ीर
हूँ
मैं
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Amaan Haider
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मैं
किसी
आँख
से
छलका
हुआ
आँसू
हूँ
'नबील'
मेरी
ताईद
ही
क्या
मेरी
बग़ावत
कैसी
Aziz Nabeel
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जिस
तरह
हँस
रहा
हूँ
मैं
पी
पी
के
गर्म
अश्क
यूँँ
दूसरा
हँसे
तो
कलेजा
निकल
पड़े
Kaifi Azmi
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दुख
में
मैं
साथ
जिसके
रहता
था
शख़्स
वो
हर
किसी
से
जलता
है
Tiwari Jitendra
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हम
परिंदों
को
आज़ाद
करते
रहे
कुछ
नए
ज़ख़्म
ईजाद
करते
रहे
वो
मुयस्सर
हमें
तो
नहीं
है
मगर
उसके
बोसे
को
हम
याद
करते
रहे
उम्र
भर
बद
दु'आ
ही
मिली
है
मुझे
बे-वफ़ा
बन
के
बे-दाद
करते
रहे
दिल
हमारा
कहीं
टूट
जाएँ
न
फिर
दिल
सँभालो
ये
फ़रियाद
करते
रहे
ख़ुद-कुशी
से
उसे
दुख
हुआ
ही
नहीं
जान
देने
में
इम्दाद
करते
रहे
वो
किसी
के
कभी
दिल
से
खेले
नहीं
जो
मिला
उसको
वो
शाद
करते
रहे
यार
मजनूँ
नहीं
और
कोई
नहीं
'जीत'
बनने
की
फ़रियाद
करते
रहे
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Tiwari Jitendra
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चला
अब
लौट
मैं
भी
गांव
अपने
शहरस
इश्क़
का
बोझा
उठा
कर
Tiwari Jitendra
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मैं
भला
उसका
भला
कैसे
करूँँ
जिसको
अब
भी
ढूंढता
है
ग़म
मिरा
Tiwari Jitendra
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काफ़िर
बनाया
हमने
उसको
इस
लिए
उसकी
दु'आएँ
बद-दु'आएँ
बन
गई
Tiwari Jitendra
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