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Saurabh Mehta 'Alfaaz'
nikalte hain kafan baandhe fana hone ki niyat se
nikalte hain kafan baandhe fana hone ki niyat se | निकलते हैं कफ़न बांधे फ़ना होने की नियत से
- Saurabh Mehta 'Alfaaz'
निकलते
हैं
कफ़न
बांधे
फ़ना
होने
की
नियत
से
के
संग
एक
ही
उछालेंगे
मगर
अबके
तबियत
से
- Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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जानती
हो
कि
क्या
हुआ
है
तुम्हें
इश्क़
का
रोग
लग
गया
है
तुम्हें
तुमको
देखें
तो
देखते
जाएँ
देखने
का
अलग
मज़ा
है
तुम्हें
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Pravin Rai
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क्या
कहूँ
तुम
से
मैं
कि
क्या
है
इश्क़
जान
का
रोग
है
बला
है
इश्क़
Meer Taqi Meer
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इस
मरज़
से
कोई
बचा
भी
है
चारा-गर
इश्क़
की
दवा
भी
है
Unknown
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वो
जिसकी
याद
ने
जीना
मुहाल
कर
रखा
है
उसी
की
आस
ने
मुझको
सँभाल
कर
रखा
है
सियाह
रातों
में
साए
से
बातें
करता
है
तुम्हारे
ग़म
ने
नया
रोग
पाल
कर
रखा
है
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Harsh saxena
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गर
अदीबों
को
अना
का
रोग
लग
जाए
तो
फिर
गुल
मोहब्बत
के
अदब
की
शाख़
पर
खिलते
नहीं
Afzal Ali Afzal
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करता
नहीं
ख़याल
तेरा
इस
ख़याल
से
तंग
आ
गया
अगर
तू
मेरी
देखभाल
से
चल
मेरे
साथ
और
तबीयत
की
फ़िक्र
छोड़
दो
मील
दूर
है
मेरा
घर
अस्पताल
से
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Tehzeeb Hafi
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भारत
के
उपकार
को,
मान
रहे
सब
लोग
रोग
'घटाने'
के
लिए,
दिया
विश्व
को
'योग'
Divy Kamaldhwaj
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कभी
हँसता
हूँ
तो
आँखें
कभी
मैं
नम
भी
रखता
हूँ
हर
इक
मुस्कान
के
पीछे
हज़ारों
ग़म
भी
रखता
हूँ
शिफ़ा
भी
दे
नहीं
सकता
मुझे
कोई
मेरा
अपना
नतीजन
मैं
मिरे
ज़ख़्मों
का
ख़ुद
मरहम
भी
रखता
हूँ
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Shubham Dwivedi
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ये
मुझे
नींद
में
चलने
की
जो
बीमारी
है
मुझ
को
इक
ख़्वाब-सरा
अपनी
तरफ़
खींचती
है
Shahid Zaki
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उल्टी
हो
गईं
सब
तदबीरें
कुछ
न
दवा
ने
काम
किया
देखा
इस
बीमारी-ए-दिल
ने
आख़िर
काम
तमाम
किया
Meer Taqi Meer
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मुसन्निफ़
हूँ
मगर
किरदार
होता
जा
रहा
हूँ
तसल्लुत
अपने
ही
लिक्खे
पे
खोता
जा
रहा
हूँ
कहानी
में
तो
इक
अंजाम
अच्छा
ही
लिखा
था
उसी
अंजाम
पर
पैहम
मैं
रोता
जा
रहा
हूँ
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Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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एक
तरीक़ा
बर्बादी
का,
हम
ने
यूँँ
ईजाद
किया
शब
भर
तन्हा-तन्हा
रोये,
मायूसी
को
शाद
किया
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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ग़ज़ल
को
कुछ
नए
चेहरे
नए
अशआ'र
देता
हूँ
मैं
यूँँ
अल्फ़ाज़
के
ख़ंजर
को
अपने
धार
देता
हूँ
कभी
जब
तैश
में
चाहूँ
किसी
का
क़त्ल
करना
मैं
तो
फिर
ग़ुस्से
में
आकर
शे'र
कोई
मार
देता
हूँ
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Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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ख़ालीपन
में
काम
हमारा
फ़िक्र
तुम्हारी
ज़िक्र
तुम्हारा
गुज़रा
वक़्त
इसी
में
सारा
फ़िक्र
तुम्हारी
ज़िक्र
तुम्हारा
ग़ालिब
ने
क्या
ख़ूब
कहा
था
इश्क़
निकम्मा
कर
डालेगा
इस
धंधे
में
सिर्फ़
ख़सारा
फ़िक्र
तुम्हारी
ज़िक्र
तुम्हारा
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Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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बे-ज़ारी
से
बू
ना
आए
तो
फिर
आँसू
चख
के
देख
चारा-गर
बोला
रोने
की
अपनी
लज़्ज़त
होती
है
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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