jab kabhi KHud ko adhoora dhundhta hooñ | जब कभी ख़ुद को अधूरा ढूँढ़ता हूँ

  - komal selacoti
जबकभीख़ुदकोअधूराढूँढ़ताहूँ
चश्म-ए-पुर-नमपरसिताराढूँढ़ताहूँ
जंगमेंहारेसेहाराढूँढ़ताहूँ
इसलिएभीघावगहराढूँढ़ताहूँ
मैंतिरीआँखेंचुराकरक्यालेआया
अबसमुंदरकाकिनाराढूँढ़ताहूँ
पूछमतमुझसेेमिरेमहबूबतेरे
आगेपीछेक्यानज़ाराढूँढ़ताहूँ
शामकोमैंआतेजातेवक़्तअक्सर
तेरीखिड़कीपरइशाराढूँढ़ताहूँ
सारादिनतेरीमिरीतस्वीरपरमैं
बसमोहब्बतकाख़साराढूँढ़ताहूँ
मक़्तल-ए-निय्यतमेंउल्फ़तकोगॅंवाकर
ज़िंदगीकाक़तराक़तराढूँढ़ताहूँ
इसक़दरतूमिलरहीहैढूँढनेपर
मैंतुझेपाकरदुबाराढूँढ़ताहूँ
इम्तिहान-ए-दहरमेंअबवक़्तदरवक़्त
बचनिकलनेकामैंफ़र्राढूँढ़ताहूँ
  - komal selacoti
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