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Shobhit Dixit
din-b-din tum khoobsurat ho rahi ho
din-b-din tum khoobsurat ho rahi ho | दिन-ब-दिन तुम ख़ूब-सूरत हो रही हो
- Shobhit Dixit
दिन-ब-दिन
तुम
ख़ूब-सूरत
हो
रही
हो
दिन-ब-दिन
हम
और
पागल
हो
रहे
हैं
- Shobhit Dixit
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अनोखी
वज़्अ
है
सारे
ज़माने
से
निराले
हैं
ये
'आशिक़
कौन
सी
बस्ती
के
या-रब
रहने
वाले
हैं
Allama Iqbal
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ये
सोचते
रहना
मुझे
पागल
ही
न
कर
दे
ये
सोचते
रहना
कि
मैं
पागल
तो
नहीं
हूँ
Aamir Azher
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अपने
होटों
की
ये
तहरीर
रखो
अपने
पास
हम
वो
'आशिक़
हैं
जो
आँखों
को
पढ़ा
करते
हैं
Meem Alif Shaz
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कभी
फूल
देखती
है
कभी
देखती
है
कलियाँ
मुझे
कर
रही
है
पागल
ये
नज़र
फिसल
फिसल
के
Ajeetendra Aazi Tamaam
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इक
नज़ाकत
से
मुझे
उसने
पागल
बोला
जब
मैंने
चूम
लिया
प्यार
से
उसके
लब
को
Parwez Akhtar
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तेरी
गली
को
छोड़
के
पागल
नहीं
गया
रस्सी
तो
जल
गई
है
मगर
बल
नहीं
गया
मजनूँ
की
तरह
छोड़ा
नहीं
मैं
ने
शहर
को
या'नी
मैं
हिज्र
काटने
जंगल
नहीं
गया
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Ismail Raaz
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जौन
तुम्हें
ये
दौर
मुबारक,
दूर
ग़म-ए-अय्याम
से
हो
एक
पागल
लड़की
को
भुला
कर
अब
तो
बड़े
आराम
से
हो
Jaun Elia
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तुम्हारी
बात
करने
की
अदा
ने
ही
किया
पागल
न
जाने
हाल
क्या
होता,
अगर
तुम
शा'इरी
करती
Tanoj Dadhich
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अब
मेरी
बात
ये
अफ़वाह
लगेगी
लेकिन
चाहता
हूँ
मैं
तुम्हें
आज
भी
पागल
की
तरह
Pravin Rai
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कोई
पागल
ही
मोहब्बत
से
नवाज़ेगा
मुझे
आप
तो
ख़ैर
समझदार
नज़र
आते
हैं
Zubair Ali Tabish
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काग़ज़
की
नाव
बनाते
थे
और
उस
पर
भी
इतराते
थे
अब
तो
छुट्टी
भर
है
बस
तब
दीवाली
यार
मनाते
थे
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Shobhit Dixit
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आँखों
पर
चश्मा
होंठों
पर
तिल
भी
है
वहीं
कहीं
देखो
तो
मेरा
दिल
भी
है
हमको
एक
पेपर
में
अव्वल
आना
है
जो
दूसरे
दर्जे
का
है
और
मुश्किल
भी
है
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Shobhit Dixit
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लोग
हमको
भी
क्या
क्या
बताते
रहे
हम
भी
उनकी
ही
बातों
में
आते
रहे
एक
कहानी
अधूरी,
अधूरी
थी
बस
हम
थे
किरदार
नए,
नए
बनाते
रहे
नींद
होनी
थी
आँखों
की
अपनी
मगर
हम
तो
अपने
सपने
को
सुलाते
रहे
झूठी
थी
सब
क़स
में
बुनियाद
की
सो
झूठे
वादों
के
मलबे
उठाते
रहे
आने
वाले
तो
आते
रहे
उम्र
भर
जाने
वाले
जो
लोग
थे
जाते
रहे
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Shobhit Dixit
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पहले
तो
इश्क़
करना
आना
भी
चाहिए
फिर
बात
बनाने
का
बहाना
भी
चाहिए
Shobhit Dixit
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पतंग
को
उस
वक़्त
खींचा
गया
हवा
जब
कह
रही
थी
ढील
दो
Shobhit Dixit
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