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Shobhit Dixit
log hamko bhi kya kya bataate rahe
log hamko bhi kya kya bataate rahe | लोग हमको भी क्या क्या बताते रहे
- Shobhit Dixit
लोग
हमको
भी
क्या
क्या
बताते
रहे
हम
भी
उनकी
ही
बातों
में
आते
रहे
एक
कहानी
अधूरी,
अधूरी
थी
बस
हम
थे
किरदार
नए,
नए
बनाते
रहे
नींद
होनी
थी
आँखों
की
अपनी
मगर
हम
तो
अपने
सपने
को
सुलाते
रहे
झूठी
थी
सब
क़स
में
बुनियाद
की
सो
झूठे
वादों
के
मलबे
उठाते
रहे
आने
वाले
तो
आते
रहे
उम्र
भर
जाने
वाले
जो
लोग
थे
जाते
रहे
- Shobhit Dixit
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मैंने
चाहा
तेरे
जाने
में
न
कुछ
कमी
रहे
कोन
चाहे
उम्र
भर
ही
आँखों
में
नमी
रहे
Yogamber Agri
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सुब्ह
होती
है
शाम
होती
है
उम्र
यूँँही
तमाम
होती
है
Munshi Amirullah Tasleem
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किसी
को
घर
से
निकलते
ही
मिल
गई
मंज़िल
कोई
हमारी
तरह
उम्र
भर
सफ़र
में
रहा
Ahmad Faraz
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खिलाड़ी
देवकीनंदन
के
जैसा
सामने
हो
तो
तजुर्बा
लाख
हो
शकुनी
भी
चौसर
हार
जाते
हैं
shashwat singh darpan
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बड़ा
घाटे
का
सौदा
है
'सदा'
ये
साँस
लेना
भी
बढ़े
है
उम्र
ज्यूँँ-ज्यूँँ
ज़िंदगी
कम
होती
जाती
है
Sada Ambalvi
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वो
जो
गीत
तुम
ने
सुना
नहीं
मेरी
उम्र
भर
का
रियाज़
था
मेरे
दर्द
की
थी
वो
दास्ताँ
जिसे
तुम
हँसी
में
उड़ा
गए
Amjad Islam Amjad
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इक
उम्र
कट
गई
है
तिरे
इंतिज़ार
में
ऐसे
भी
हैं
कि
कट
न
सकी
जिन
से
एक
रात
Firaq Gorakhpuri
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आप
से
बाद
बिछड़ने
के
खुला
ये
हम
पे
उम्र
तन्हा
ही
गुज़र
जाती,
तो
अच्छा
होता
Chandan Sharma
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एक
दिन
देखने
को
आ
जाते
ये
हवस
उम्र
भर
नहीं
होती
Ibn E Insha
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मिल
गए
थे
एक
बार
उस
के
जो
मेरे
लब
से
लब
उम्र
भर
होंटों
पे
अपने
मैं
ज़बाँ
फेरा
किया
Jurat Qalandar Bakhsh
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जिन
हाथों
से
हो
कश्मीर
बनाते
तुम
काश
उसी
से
हर
तक़दीर
बनाते
तुम
Shobhit Dixit
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तेरी
ही
यादों
में
पाकीज़ा
होना
पड़ता
है
उसके
ख़ातिर
भी
इन
आँखों
को
रोना
पड़ता
है
तुमको
तो
बस
मेरे
ख़्वाबों
में
आना
होता
है
ये
सोचो
मुझको
तो
रातों
में
सोना
पड़ता
है
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Shobhit Dixit
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हम
तो
जाकर
दहलीज़ों
पर
बैठे
हैं
जब
देखा
है
दरवाज़ों
पर
ताले
हैं
Shobhit Dixit
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छत
पे
जाने
को
बोल
रहे
हैं
फिर
तह
ख़ानों
को
खोल
रहे
हैं
दस्तक
देने
में
डर
लगता
है
सो
खुल
जा
सिम
सिम
बोल
रहे
हैं
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Shobhit Dixit
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सब
सेे
कठिन
सवाल
पूछता
है
हम
सेे
हमारा
हाल
पूछता
है
जवाब
कहकहे
से
निकलते
हैं
पूछने
वाला
बेमिसाल
पूछता
है
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Shobhit Dixit
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