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Shekhar kumar
gar jahannum hi rahi hai zindagi saari meri
gar jahannum hi rahi hai zindagi saari meri | गर जहन्नुम ही रही है ज़िंदगी सारी मेरी
- Shekhar kumar
गर
जहन्नुम
ही
रही
है
ज़िंदगी
सारी
मेरी
बाद
मरने
के
मिले
जन्नत
ज़रूरी
तो
नहीं
- Shekhar kumar
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निगाहें
फेर
ली
घबरा
के
मैंने
वो
तुम
से
ख़ूब-सूरत
लग
रही
थी
Fahmi Badayuni
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किसी
को
घर
से
निकलते
ही
मिल
गई
मंज़िल
कोई
हमारी
तरह
उम्र
भर
सफ़र
में
रहा
Ahmad Faraz
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ये
शाम
ख़ुशबू
पहन
के
तेरी
ढली
है
मुझ
में
जो
रेज़ा
रेज़ा
मैं
क़तरा
क़तरा
पिघल
रही
हूँ
ख़मोश
शब
के
समुंदरों
में
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Kiran K
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सिवा
इसके
कुछ
अच्छा
ही
नहीं
लगता
है
शामों
में
सफ़र
कैसा
भी
हो
घर
को
परिंदे
लौट
जाते
हैं
Aarush Sarkaar
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मुझे
एक
लाश
कहकर
न
बहाओ
पानियों
में
मेरा
हाथ
छू
के
देखो
मेरी
नब्ज़
चल
रही
है
Azm Shakri
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सफ़र
हालाँकि
तेरे
साथ
अच्छा
चल
रहा
है
बराबर
से
मगर
एक
और
रास्ता
चल
रहा
है
Shariq Kaifi
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प्यार
करने
की
हिम्मत
नहीं
उनके
पास
और
हम
सेे
किनारा
भी
होता
नहीं
बात
सीधे
कही
भी
नहीं
जा
रही
और
कोई
इशारा
भी
होता
नहीं
उसको
उम्मीद
है
ऐश
होगी
बसर
साथ
में
जब
रहेगी
मिरे
वो
मगर
मुझपे
जितनी
मुहब्बत
बची
है
सखी
इतने
में
तो
गुज़ारा
भी
होता
नहीं
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Divyansh "Dard" Akbarabadi
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मुझ
में
अब
मैं
नहीं
रही
बाक़ी
मैं
ने
चाहा
है
इस
क़दर
तुम
को
Ambreen Haseeb Ambar
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इश्क़
अगर
बढ़ता
है
तो
फिर
झगड़े
भी
तो
बढ़ते
हैं
आमदनी
जब
बढ़ती
है
तो
ख़र्चे
भी
तो
बढ़ते
हैं
माना
मंज़िल
नहीं
मिली
है
हमको
लेकिन
रोज़ाना
एक
क़दम
उसकी
जानिब
हम
आगे
भी
तो
बढ़ते
हैं
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Tanoj Dadhich
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न
जाने
कैसी
महक
आ
रही
है
बस्ती
से
वही
जो
दूध
उबलने
के
बाद
आती
है
Munawwar Rana
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उसके
होंठ
को
छूता
हूँ
तो
यूँँ
लगता
है
उसका
बोसा
अगली
कयामत
ला
सकता
है
Shekhar kumar
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ट्यूशन
जाना
सिर्फ़
बहाना
होता
था
मेरा
मकसद
उस
सेे
मिलना
होता
था
शायद
आ
कर
मुझ
सेे
वो
कुछ
पूछ
ही
ले
इसलिए
मुझको
पढ़
के
जाना
होता
था
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Shekhar kumar
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ये
क्या
सितम
है
कि
नज़रों
में
अब
नहीं
चुभता
यूँँ
उस
का
ग़ैर
के
हाथों
को
थाम
कर
चलना
Shekhar kumar
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उठानी
पड़
रही
हैं
ईंट
हमको
किताबें
बोझ
लगती
थी
हमेशा
Shekhar kumar
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उलझा
उलझा
ये
राब्ता
क्यूँ
है
इश्क़
गर
है
तो
फ़ासला
क्यूँ
है
कुछ
नहीं
अपने
दरमियाँ
तो
फिर
तू
मेरी
ओर
देखता
क्यूँ
है
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Shekhar kumar
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