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Asad Khan
usne ham pe kaii ilzaam to jhoothe rakhe
usne ham pe kaii ilzaam to jhoothe rakhe | उसने हम पे कई इल्ज़ाम तो झूठे रक्खे
- Asad Khan
उसने
हम
पे
कई
इल्ज़ाम
तो
झूठे
रक्खे
हमने
फिर
भी
मियाँ
मज़बूत
कलेजे
रक्खे
मैं
तो
क्या
सोच
के
दाख़िल
हुआ
घर
में
और
फिर
रह
गए
गजरे
यूँँ
ही
मेज़
पे
रक्खे
रक्खे
- Asad Khan
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ये
तेरे
ख़्वाब
से
जुड़ी
हुई
है
नींद
जो
आँख
में
भरी
हुई
है
मेरे
तो
सारे
ज़ख़्म
ताज़ा
हैं
आपकी
चोट
ही
सड़ी
हुई
है
ऐसा
क्या
काम
है
तुझे
ऐ
दोस्त
जाने
की
जल्दी
क्यूँ
लगी
हुई
है
आज
भी
इंतिज़ार
में
तेरे
इक
घड़ी
मेज़
पर
पड़ी
हुई
है
चंद
नोटों
के
नीचे
बटवे
में
उसकी
तस्वीर
भी
रखी
हुई
है
दिल
को
पत्थर
बना
के
रक्खा
है
ज़िंदगी
ठाठ
पे
अड़ी
हुई
है
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Asad Khan
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सब
शुरू
में
हम
सेे
अच्छा
बोलते
हैं
बेसबब
फिर
उल्टा
सीधा
बोलते
हैं
आज
इक
चिड़िया
ने
मुझको
ये
बताया
पेड़
इक
दूजे
से
कितना
बोलते
हैं
दोस्त
कुछ
ऐसे
मिले
हैं
इस
सफ़र
में
शे'र
कैसा
भी
हो
अच्छा
बोलते
हैं
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Asad Khan
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उसकी
सभी
बातों
पे
पर्दा
होता
है
ऊपर
से
उसका
मीठा
लहजा
होता
है
अब
सामने
हूँ
तेरे
मुझको
देख
तो
ठहरा
हुआ
दरिया
भी
कैसा
होता
है
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Asad Khan
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वैसे
तो
उम्र
थी
पढ़ाई
की
ख़ैर
हम
ने
ग़ज़ल
सराई
की
Asad Khan
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बीत
जाऊँगा
मैं
तो
लम्हा
हूँ
फिर
न
आऊँगा
चाहे
जैसा
हूँ
वक़्त
से
मेरी
रेस
लग
गई
थी
मैं
उसे
पीछे
छोड़
आया
हूँ
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Asad Khan
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