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Asad Khan
mere peechhe zamaana pad gaya hai
mere peechhe zamaana pad gaya hai | मेरे पीछे ज़माना पड़ गया है
- Asad Khan
मेरे
पीछे
ज़माना
पड़
गया
है
गले
रब
को
लगाना
पड़
गया
है
बनाना
था
कहीं
पर
ग्लोब
हम
को
तेरा
चेहरा
बनाना
पड़
गया
है
- Asad Khan
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इस
जवानी
का
फ़साना
भूल
जाऊॅं
ज़ख़्मी
हूॅं
तो
दिल
लगाना
भूल
जाऊॅं
यानी
तुझको
याद
करना
बंद
कर
दूॅं
यानी
मेरी
जाँ
मैं
खाना
भूल
जाऊॅं
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Asad Khan
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अपनी
दीद
की
कुछ
यूँँ
तासीर
भेजी
है
लिबास-ए-ईद
में
उसने
तस्वीर
भेजी
है
Asad Khan
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वैसे
तो
उम्र
थी
पढ़ाई
की
ख़ैर
हम
ने
ग़ज़ल
सराई
की
Asad Khan
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तुम्हें
लगता
है
तेज़ी
हो
रही
है
हमारी
उम्र
छोटी
हो
रही
है
वहाॅं
पे
कोई
फाॅंसी
खा
रहा
है
वहाॅं
पे
कोई
शादी
हो
रही
है
ख़यालों
की
ही
वेकेंसी
न
आई
कई
शे'रों
की
भर्ती
हो
रही
है
हमें
सपने
दिखाए
जा
रहे
हैं
किसी
की
नींद
पूरी
हो
रही
है
हमारा
जिस्म
सूखा
पड़
रहा
है
हमारी
रूह
प्यासी
हो
रही
है
गया
वो
छोड़
के
क़िस्सा
करो
ख़त्म
असद
दफ़्तर
में
देरी
हो
रही
है
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Asad Khan
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ये
तेरे
ख़्वाब
से
जुड़ी
हुई
है
नींद
जो
आँख
में
भरी
हुई
है
मेरे
तो
सारे
ज़ख़्म
ताज़ा
हैं
आपकी
चोट
ही
सड़ी
हुई
है
ऐसा
क्या
काम
है
तुझे
ऐ
दोस्त
जाने
की
जल्दी
क्यूँ
लगी
हुई
है
आज
भी
इंतिज़ार
में
तेरे
इक
घड़ी
मेज़
पर
पड़ी
हुई
है
चंद
नोटों
के
नीचे
बटवे
में
उसकी
तस्वीर
भी
रखी
हुई
है
दिल
को
पत्थर
बना
के
रक्खा
है
ज़िंदगी
ठाठ
पे
अड़ी
हुई
है
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Asad Khan
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