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Asad Khan
inhen maaloom hai rutba hamaara
inhen maaloom hai rutba hamaara | इन्हें मालूम है रुतबा हमारा
- Asad Khan
इन्हें
मालूम
है
रुतबा
हमारा
सो
ये
सुनते
नहीं
रोना
हमारा
बिता
दी
उम्र
सारी
इस
गुमाँ
में
अभी
तो
ज़िंदा
है
रिश्ता
हमारा
तेरी
तस्वीर
जब
होती
थी
इस
में
भरा
ही
रहता
था
बटवा
हमारा
वो
वाली
बेंच
पर
तुम
बैठना
सिर्फ़
वहाँ
पर
नाम
लिख
देना
हमारा
मुहब्बत
में
गुज़ारी
थी
जवानी
बुढ़ापे
में
हुआ
झगड़ा
हमारा
- Asad Khan
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बंद
कमरा,
सर
पे
पंखा,
तीरगी
है
और
मैं
एक
लड़ाई
चल
रही
है
ज़िंदगी
है
औऱ
मैं
Shadab Asghar
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कभी
तो
ख़त्म
हो
ये
जंग
जिस
में
फ़क़त
मरने
को
जीना
पड़
रहा
है
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Anand Verma
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यार
ने
हम
से
बे-अदाई
की
वस्ल
की
रात
में
लड़ाई
की
Meer Taqi Meer
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हम
अम्न
चाहते
हैं
मगर
ज़ुल्म
के
ख़िलाफ़
गर
जंग
लाज़मी
है
तो
फिर
जंग
ही
सही
Sahir Ludhianvi
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आँधियों
से
लड़
रहे
हैं
जंग
कुछ
काग़ज़
के
लोग
हम
पे
लाज़िम
है
कि
इन
लोगों
को
फ़ौलादी
कहें
Ameer Imam
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हर
दिन
ही
मोहब्बत
को
पाने
की
लड़ाई
में
जो
हार
नहीं
सकता
वो
जीत
नहीं
सकता
Hasan Raqim
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लड़ाई
है
तो
अच्छा
रात-भर
यूँँ
ही
बसर
कर
लो
हम
अपना
मुँह
इधर
कर
लें
तुम
अपना
मुँह
उधर
कर
लो
Muztar Khairabadi
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वो
जंग
जिस
में
मुक़ाबिल
रहे
ज़मीर
मिरा
मुझे
वो
जीत
भी
'अंबर'
न
होगी
हार
से
कम
Ambreen Haseeb Ambar
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जंग
तो
ख़ुद
ही
एक
मसअला
है
जंग
क्या
मसअलों
का
हल
देगी
Sahir Ludhianvi
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देश
मेरा
जंग
तो
जीता
मगर
लौट
कर
आया
नहीं
बेटा
मेरा
Divy Kamaldhwaj
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कोई
हीरा
नहीं
है
गट्ठर
में
क्यूँ
पड़े
हो
तुम
इसके
चक्कर
में
किसी
ने
जंग
को
पुकारा
था
किसी
को
छोड़
आया
बिस्तर
में
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Asad Khan
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ये
तेरे
ख़्वाब
से
जुड़ी
हुई
है
नींद
जो
आँख
में
भरी
हुई
है
मेरे
तो
सारे
ज़ख़्म
ताज़ा
हैं
आपकी
चोट
तो
सड़ी
हुई
है
ऐसा
क्या
काम
है
तुझे
ऐ
दोस्त
जाने
की
जल्दी
क्यूँ
लगी
हुई
है
आज
भी
इंतिज़ार
में
तेरे
इक
घड़ी
मेज़
पर
पड़ी
हुई
है
चंद
नोटों
के
नीचे
बटवे
में
उसकी
तस्वीर
भी
रखी
हुई
है
दिल
को
पत्थर
बना
के
रक्खा
है
ज़िंदगी
ठाठ
पे
अड़ी
हुई
है
कैसे
सर
पे
चढ़ूॅं
मैं
दुनिया
के
ये
तो
ख़ुद
में
बहुत
गिरी
हुई
है
वर्ना
वो
ऐसा
क्यूँ
करेगा
भला
आज
उसने
शराब
पी
हुई
है
कैसे
कह
दूॅं
उसे
मोहब्बत
नइॅं
ग़म-ए-फ़ुर्क़त
से
वो
दुखी
हुई
है
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Asad Khan
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फूल
पर
मानो
तितलियाँ
नहीं
हैं
जिसके
भी
घर
में
बेटियाँ
नहीं
हैं
ज़िंदगी
ऐसी
खेल
है
जिस
में
साँप
हैं
और
सीढ़ियाँ
नहीं
हैं
मुझको
बारिश
अज़ीज़
है
यारों
यूँँॅं
ही
कहता
हूॅं
छतरियाँ
नहीं
हैं
उसको
बच्चों
के
साथ
देखा
था
उसके
हाथों
में
चूड़ियाँ
नहीं
हैं
मेरे
इक
बोसे
से
खुलेगी
वो
उस
तिजोरी
की
चाबियाँ
नहीं
हैं
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Asad Khan
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सब
शुरू
में
हम
सेे
अच्छा
बोलते
हैं
बेसबब
फिर
उल्टा
सीधा
बोलते
हैं
रात
जंगल
में
गुज़ारी
तो
ये
पाया,
पेड़
इक
दूजे
से
कितना
बोलते
हैं
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Asad Khan
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उसकी
सभी
बातों
पे
पर्दा
होता
है
ऊपर
से
उसका
मीठा
लहजा
होता
है
अब
सामने
हूँ
तेरे
मुझको
देख
तो
ठहरा
हुआ
दरिया
भी
कैसा
होता
है
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Asad Khan
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