माज़ी को याद कर के बिलखता है रोज़ रोज़

  - Dipanshu Shams
माज़ीकोयादकरकेबिलखताहैरोज़रोज़
कमबख़्तदिलकाअच्छातमाशाहैरोज़रोज़
मज़हबथमाकेहाथमेंशमशीरधारदार
इंसानियतकाक़त्लकराताहैरोज़रोज़
ढूँढाहैचार-सूयेमिलीहैआजतक
सूरजनेशबकोख़ूबतलाशाहैरोज़रोज़
बसकुछक़दमहीदूरहैमंज़िलयेबोलके
आरामकोजुनूनघुमाताहैरोज़रोज़
ज़ुल्मतसेजंगकरतेहुएथककेचूरचाँद
आख़िरमें'शम्स'कोहीजगाताहैरोज़रोज़
  - Dipanshu Shams
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