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Dipanshu Shams
mutthi se ret ko na fisalne do pahle aap
mutthi se ret ko na fisalne do pahle aap | मुठ्ठी से रेत को न फिसलने दो पहले आप
- Dipanshu Shams
मुठ्ठी
से
रेत
को
न
फिसलने
दो
पहले
आप
फिर
शौक़
से
हुज़ूर
बड़े
ख़्वाब
देखना
- Dipanshu Shams
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मुठ्ठी
से
रेत
को
न
फिसलने
दो
पहले
आप
फिर
शौक़
से
हुज़ूर
बड़े
ख़्वाब
देखना
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धूप
बादल
बारिशों
के
दरमियाँ
रब्त
है
इक
मौसमों
के
दरमियाँ
सौ
मआनी
इश्क़
के
खुलने
लगे
बैठा
जब
मैं
आशिक़ों
के
दरमियाँ
सिर्फ़
हम
दोनों
नज़र
आएँगे!
जान
देखो
आ
कर
चाहतों
के
दरमियाँ
ज़ब्त
आख़िर
कब
तलक
करता
भला
रो
पड़ा
वो
कहकहों
के
दरमियाँ
दिल
सुकूँ
की
जुस्तजू
करता
है
रोज़
ज़ीस्त
के
इन
मसअलों
के
दरमियाँ
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Dipanshu Shams
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तमाशे
के
लिए
उसको
फ़क़त
इंसाँ
जुटाने
हैं
मदारी
जानता
है
ये
ज़माना
पागलों
का
है
Dipanshu Shams
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पार
इस
हद्दे-जुनूँ
को
अपने
हर
पल
हम
करेंगे
या
तो
पागल
हम
बनेंगे
या
तो
पागल
हम
करेंगे
Dipanshu Shams
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तमाशे
के
लिए
उसको
फ़क़त
इंसाँ
जुटाने
हैं
मदारी
जानता
है
ये
ज़माना
पागलों
का
है
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