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Shajar Abbas
udaasiyon men chalo muskuraa ke dekhte hain
udaasiyon men chalo muskuraa ke dekhte hain | उदासियों में चलो मुस्कुरा के देखते हैं
- Shajar Abbas
उदासियों
में
चलो
मुस्कुरा
के
देखते
हैं
हुनर
नया
है
मगर
आज़मा
के
देखते
हैं
- Shajar Abbas
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देख
कैसे
धुल
गए
है
गिर्या-ओ-ज़ारी
के
बाद
आसमाँ
बारिश
के
बाद
और
मैं
अज़ादारी
के
बाद
इस
सेे
बढ़
कर
तो
तुझे
कोई
हुनर
आता
नहीं
सोचता
हूँ
क्या
करेगा
दिल
आज़ारी
के
बाद
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Abbas Tabish
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अना
को
अपनी
समझाना
पड़ेगा
बुलाती
है,
तो
फिर
जाना
पड़ेगा
Salman Zafar
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नाज़-ओ-नख़रे
क्या
उठाए,
क्या
सुने
उस
के
गिले
देखते
ही
देखते
लड़की
घमंडी
हो
गई
देखते
रहने
में
उस
को
और
क्या
होता,
मगर
जो
थी
जान-ए-आरज़ू,
वो
चाय
ठंडी
हो
गई
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Kazim Rizvi
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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वो
जिस
घमंड
से
बिछड़ा
गिला
तो
इस
का
है
कि
सारी
बात
मोहब्बत
में
रख-रखाव
की
थी
Ahmad Faraz
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पा
ए
उम्मीद
प
रक्खे
हुए
सर
हैं
हम
लोग
हैं
न
होने
के
बराबर
ही
मगर
हैं
हम
लोग
तू
ने
बरता
ही
नहीं
ठीक
से
हम
को
ऐ
दोस्त
ऐब
लगते
हैं
ब-ज़ाहिर
प
हुनर
हैं
हम
लोग
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Abhishek shukla
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ख़ुद
को
मनवाने
का
मुझको
भी
हुनर
आता
है
मैं
वो
कतरा
हूँ
समुंदर
मेरे
घर
आता
है
Waseem Barelvi
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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हाँ
ठीक
है
मैं
अपनी
अना
का
मरीज़
हूँ
आख़िर
मिरे
मिज़ाज
में
क्यूँँ
दख़्ल
दे
कोई
Jaun Elia
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हम
भी
दरिया
हैं
हमें
अपना
हुनर
मालूम
है
जिस
तरफ़
भी
चल
पड़ेंगे
रास्ता
हो
जाएगा
Bashir Badr
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तुम्हारी
याद
से
ग़ाफ़िल
नहीं
रहूँगा
कभी
हमेशा
ज़ख़्म-ए-जिगर
को
हरा
रखूँगा
मैं
Shajar Abbas
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पागल
ये
तेरी
उम्र
मोहब्बत
की
उम्र
है
तू
छोड़
ये
किताबें
गुलाबों
से
इश्क़
कर
Shajar Abbas
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ज़िंदगी
उजड़े
हुए
घर
की
तरह
लगती
है
बाप
का
साया
अगर
सर
पे
नहीं
होता
है
Shajar Abbas
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देख
के
तुझको
ये
लगता
है
पागल
है
पागल
मुझको
बोल
रहा
है
पागल
है
Shajar Abbas
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चाय
दो
कुल्हड़
थी
टेबल
पर
शजर
पर
मलाल
इसका
है
बस
तन्हा
थे
हम
Shajar Abbas
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