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Shajar Abbas
ik pal sukoon se sone na degi ghamon kii raat
ik pal sukoon se sone na degi ghamon kii raat | इक पल सुकूँ से सोने न देगी ग़मों की रात
- Shajar Abbas
इक
पल
सुकूँ
से
सोने
न
देगी
ग़मों
की
रात
मुझ
पर
नया
अज़ाब
बनेगी
ग़मों
की
रात
हमराह
मेरे
चलती
रहेगी
ग़मों
की
रात
मैं
सोचता
हूँ
कैसे
कटेगी
ग़मों
की
रात
ये
लग
रहा
है
दश्त
में
हमराह
बैठ
कर
जी
भर
के
मुझ
सेे
बातें
करेगी
ग़मों
की
रात
ख़ुशियों
का
आफ़ताब
न
होगा
कभी
तुलू
पल
पल
तवील
होती
रहेगी
ग़मों
की
रात
- Shajar Abbas
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शबो
रोज़
की
चाकरी
ज़िन्दगी
की
मुयस्सर
हुईं
रोटियाँ
दो
घड़ी
की
नहीं
काम
आएँ
जो
इक
दिन
मशीनें
ज़रूरत
बने
आदमी
आदमी
की
कि
कल
शाम
फ़ुरसत
में
आई
उदासी
बता
दी
मुझे
क़ीमतें
हर
ख़ुशी
की
किया
क्या
अमन
जी
ने
बाइस
बरस
में
कभी
जी
लिया
तो
कभी
ख़ुद-कुशी
की
ग़मों
को
ठिकाने
लगाते
लगाते
घड़ी
आ
गई
आदमी
के
ग़मी
की
ये
सारी
तपस्या
का
कारण
यही
है
मिसालें
बनें
तो
बनें
सादगी
की
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Aman G Mishra
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हमारी
मौत
पर
बेशक़
ज़माना
आएगा
रोने
मगर
ज़िंदा
हैं
जब
तक
चैन
से
जीने
नहीं
देगा
Astitwa Ankur
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कुछ
तो
करें
कि
दिल
ये
कहीं
और
जा
लगे
कुछ
देर
के
लिए
सही
आँखों
को
चैन
हो
Afzal Ali Afzal
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थकना
भी
लाज़मी
था
कुछ
काम
करते
करते
कुछ
और
थक
गया
हूँ
आराम
करते
करते
Zafar Iqbal
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एक
तख़्ती
अम्न
के
पैग़ाम
की
टांग
दीजे
ऊंचे
मीनारों
के
बीच
Aziz Nabeel
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बस्ती
बस्ती
ख़ाक
उड़ाये,
बस
वहशत
का
मारा
हो
उस
सेे
इश्क़
की
आस
न
करना
जिसका
मन
बंजारा
हो
ख़ुद
को
शाइर
कहते
रहना
दिल
को
लाख
सुकूँ
दे
दे
लेकिन
दुनिया
की
नज़रों
में
तुम
अब
भी
आवारा
हो
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Daagh Aligarhi
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सुकून
क़ल्ब
को
जिस
से
मिल
जाए
'ताबाँ'
ग़ज़ल
कोई
ऐसी
सुना
दीजिएगा
Anwar Taban
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बोझ
उठाए
हुए
फिरती
है
हमारा
अब
तक
ऐ
ज़मीं
माँ
तिरी
ये
उम्र
तो
आराम
की
थी
Parveen Shakir
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उँगलियों
चैन
पड़
गया
तुमको
उसने
इग्नोर
कर
दिया
मैसेज
Nadim Nadeem
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इतना
तो
ज़िंदगी
में
किसी
के
ख़लल
पड़े
हँसने
से
हो
सुकून
न
रोने
से
कल
पड़े
Kaifi Azmi
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अपने
महबूब
से
इक
रात
की
मोहलत
लेकर
हुरमला
बनने
से
हुर
तुझको
बचाया
हमने
Shajar Abbas
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अभी
तक
ये
नहीं
आया
समझ
में
ये
मेरे
साथ
में
क्या
हो
रहा
है
तेरी
यादों
में
उलझा
है
मिरा
मन
तेरी
फ़ुर्क़त
में
ये
दिल
रो
रहा
है
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Shajar Abbas
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रक्खा
ग़ज़ल
का
मौज़ू
नया
इश्क़
और
मैं
होंगे
नहीं
कभी
भी
जुदा
इश्क़
और
मैं
हैं
इक
हसीं
के
लब
की
दु'आ
इश्क़
और
मैं
देते
हैं
ये
जहाँ
को
पता
इश्क़
और
मैं
ये
सोचता
था
रक्खूँ
ग़ज़ल
की
रदीफ़
क्या
इतने
में
मेरे
दिल
ने
कहा
इश्क़
और
मैं
जिस
तरह
रूह
साथ
में
रहती
है
जिस्म
के
रहते
हैं
ऐसे
साथ
सदा
इश्क़
और
मैं
बस
तीन
चीज़ें
लाइक़-ए-तस्लीम
हैं
शजर
ये
याद
रखना
मेरा
ख़ुदा
इश्क़
और
मैं
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Shajar Abbas
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जिसने
लौटाई
है
सज्जाद
के
होंठों
की
हँसी
उसको
तारीख़
में
मुख़्तार
कहा
जाता
है
Shajar Abbas
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क्यूँ
न
चूमूँ
तुम्हारे
नक्श-ए-क़दम
बानी-ए-इंक़लाब-ए-हुस्न
हो
तुम
Shajar Abbas
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