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Shajar Abbas
ghalib-o-mir sa maana meraa deevaan nahin
ghalib-o-mir sa maana meraa deevaan nahin | ग़ालिब-ओ-मीर सा माना मेरा दीवान नहीं
- Shajar Abbas
ग़ालिब-ओ-मीर
सा
माना
मेरा
दीवान
नहीं
मुझ
सा
शायर
भी
शजर
होना
कुछ
आसान
नहीं
मान
लूँ
कैसे
मोहम्मद
का
सहाबा
उसको
या
अली
आप
पे
जिस
शख़्स
का
ईमान
नहीं
हज़रत-ए-शेख़
मुझे
लेके
चलो
कू-ए-बुताँ
क़ल्ब-ए-मुज़तर
में
मेरे
ख़ुल्द
का
अरमान
नहीं
- Shajar Abbas
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ग़म-ए-हयात
ने
आवारा
कर
दिया
वर्ना
थी
आरज़ू
कि
तिरे
दर
पे
सुब्ह
ओ
शाम
करें
Majrooh Sultanpuri
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल,
तो
जुस्तजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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अश्कों
को
आरज़ू-ए-रिहाई
है
रोइए
आँखों
की
अब
इसी
में
भलाई
है
रोइए
Abbas Qamar
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बहाने
और
भी
होते
जो
ज़िंदगी
के
लिए
हम
एक
बार
तिरी
आरज़ू
भी
खो
देते
Majrooh Sultanpuri
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हुस्न
बख़्शा
जो
ख़ुदा
ने
आप
बख़्शें
दीद
अपनी
आरज़ू–ए–चश्म
पूरी
हो
मुकम्मल
ईद
अपनी
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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कुछ
इस
लिए
भी
तेरी
आरज़ू
नहीं
है
मुझे
मैं
चाहता
हूँ
मेरा
इश्क़
जावेदानी
हो
Vipul Kumar
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ख़मोशी
मेरी
मअनी-ख़ेज़
थी
ऐ
आरज़ू
कितनी
कि
जिस
ने
जैसा
चाहा
वैसा
अफ़्साना
बना
डाला
Arzoo Lakhnavi
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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आरज़ू
वस्ल
की
रखती
है
परेशाँ
क्या
क्या
क्या
बताऊँ
कि
मेरे
दिल
में
है
अरमाँ
क्या
क्या
Akhtar Shirani
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हज़ारों
ख़्वाहिशें
ऐसी
कि
हर
ख़्वाहिश
पे
दम
निकले
बहुत
निकले
मिरे
अरमान
लेकिन
फिर
भी
कम
निकले
Mirza Ghalib
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ईद
का
चाँद
देखने
के
लिए
आज
वो
छत
पे
आने
वाली
है
साथ
में
हैं
सहेलियाँ
उसकी
चाँद
की
ईद
होने
वाली
है
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Shajar Abbas
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मैं
अपने
दर्द
की
ऐसे
दवा
बनाऊँगी
ग़ज़ल
बनाऊँगी
मैं
मर्सिया
बनाऊँगी
तू
चाहता
था
तुझे
बा
रिदा
नज़र
आऊँ
शजर
मैं
ख़ुद
को
ले
अब
बा
रिदा
बनाऊँगी
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Shajar Abbas
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मोहब्बत
कर
रहे
हैं
इश्क़-ओ-चाहत
कर
रहे
हैं
हम
इबादत
बस
इबादत
बस
इबादत
कर
रहे
हैं
हम
मोहब्बत
के
मुसल्ले
पर
हर
एहल-ए-सुबह
कसरत
से
किताब-ए-इश्क़
की
मुर्शिद
तिलावत
कर
रहे
हैं
हम
ज़ियारत
करके
तेरे
चेहरा-ए-अनवर
की
लगता
है
कि
जैसे
रोज़
काबे
की
ज़ियारत
कर
रहे
हैं
हम
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Shajar Abbas
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मुझ
सेे
मिरे
अहबाब
हसद
करने
लगे
हैं
मिलकर
सभी
दुश्मन
की
मदद
करने
लगे
हैं
था
इश्क़
की
मैं
जितनी
रिवायात
का
रावी
वो
सारी
रिवायात
ये
रद
करने
लगे
हैं
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Shajar Abbas
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हमने
तिरे
फ़िराक़
का
कुछ
इतना
ग़म
किया
दाढ़ी
सफ़ेद
हो
गई
ज़ुल्फ़ों
के
साथ
साथ
Shajar Abbas
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