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Shadab Shabbiri
zahe naseeb tiri raahguzaar jo mil jaati
zahe naseeb tiri raahguzaar jo mil jaati | ज़हे नसीब तिरी रहगुज़र जो मिल जाती
- Shadab Shabbiri
ज़हे
नसीब
तिरी
रहगुज़र
जो
मिल
जाती
तो
इस
तरह
न
ज़माने
में
दर
बदर
होता
- Shadab Shabbiri
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कोई
भी
रोक
न
पाता,
गुज़र
गया
होता
मेरा
नसीब-ए-मोहब्बत
सँवर
गया
होता
न
आईं
होती
जो
बेग़म
मेरी
अयादत
को
मैं
अस्पताल
की
नर्सों
पर
मर
गया
होता
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Paplu Lucknawi
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ख़्वाहिश
सब
रखते
हैं
तुझको
पाने
की
और
फिर
अपनी
अपनी
क़िस्मत
होती
है
Bhaskar Shukla
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किताब-ए-मुक़द्दर
में
रांझा
दिवाना
मगर
हीर
बेहद
सयानी
लिखी
थी
Amaan Pathan
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ये
कब
कहते
हैं
कि
आकर
हमको
गले
लगा
ले
वो
मिल
जाए
तो
रस्मन
ही
बस
हाथ
मिला
ले
काफ़ी
है
इतने
कहाँ
नसीब
कि
इस
सेे
प्यास
बुझाएँ
खेल
करें
दरिया
हम
जैसों
को
अपने
पास
बिठा
ले
काफ़ी
है
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Vashu Pandey
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मिलने
की
तरह
मुझ
सेे
वो
पल
भर
नहीं
मिलता
दिल
उस
से
मिला
जिस
सेे
मुक़द्दर
नहीं
मिलता
Naseer Turabi
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तुम्हारे
ख़त
को
जलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
ये
दिल
बाहर
निकलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
तुम्हारा
फ़ैसला
है
पास
रुकना
या
नहीं
रुकना
मेरी
क़िस्मत
बदलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
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Tanoj Dadhich
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फिर
एक
रोज़
मुक़द्दर
से
हार
मानी
गई
ज़बीन
चूम
के
बोला
गया
"ख़ुदा
हाफ़िज़"
Afkar Alvi
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हुस्न
को
भी
कहाँ
नसीब
'जिगर'
वो
जो
इक
शय
मिरी
निगाह
में
है
Jigar Moradabadi
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ज़िंदगी
में
आई
वो
जैसे
मेरी
तक़दीर
हो
और
उसी
तक़दीर
से
फिर
चोट
खाना
याद
है
Rohit tewatia 'Ishq'
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मैं
उन्हीं
आबादियों
में
जी
रहा
होता
कहीं
तुम
अगर
हँसते
नहीं
उस
दिन
मेरी
तक़दीर
पर
Zia Mazkoor
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हाल-ए-दिल
दीवार-ओ-दर
से
यूँँ
बयाँ
करते
रहे
रात
भर
रह
रह
के
हम
आह-ओ-फ़ुग़ाँ
करते
रहे
Shadab Shabbiri
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दह्र
की
बस
यहीं
हक़ीक़त
है
कुछ
नहीं
है
यहाँ
हक़ीक़त
में
Shadab Shabbiri
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बर्क़
दिल
पर
मिरे
गिराएगा
करके
वा'दा
वो
फिर
न
आएगा
Shadab Shabbiri
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टूटता
क्यूँ
है
फिर
बदन
मेरा
आज
तो
मैं
कहीं
गया
भी
नहीं
Shadab Shabbiri
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झूठ
जो
जितना
बोल
ले
बढ़कर
हाँ
वही
शख़्स
मो'तबर
है
अब
Shadab Shabbiri
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