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Shadab Shabbiri
waqt-e-aakhir jo rafeeqon ne vafaa ki hoti
waqt-e-aakhir jo rafeeqon ne vafaa ki hoti | वक़्त-ए-आख़िर जो रफ़ीक़ों ने वफ़ा की होती
- Shadab Shabbiri
वक़्त-ए-आख़िर
जो
रफ़ीक़ों
ने
वफ़ा
की
होती
है
यक़ीं
मुझको
कभी
जंग
न
हारा
होता
- Shadab Shabbiri
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जंग
में
जिन्हे
अब
तक
तुम
झुका
न
पाए
थे
झुक
रही
हैं
वो
सारी
पगड़ियाँ
मोहब्बत
में
Alankrat Srivastava
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न
जाने
किस
लिए
उम्मीद-वार
बैठा
हूँ
इक
ऐसी
राह
पे
जो
तेरी
रहगुज़र
भी
नहीं
Faiz Ahmad Faiz
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आँधियों
से
लड़
रहे
हैं
जंग
कुछ
काग़ज़
के
लोग
हम
पे
लाज़िम
है
कि
इन
लोगों
को
फ़ौलादी
कहें
Ameer Imam
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चुप
हुए
तो
घर
से
निकले
जा
के
दफ़्तर
रो
पड़े
इश्क़
ऐसी
जंग
है
जिस
में
सिकंदर
रो
पड़े
बस
दिलों
पर
कब
किसी
का
चल
सका
है
इश्क़
में
फिर
से
डायल
कर
के
हम
वो
एक
नंबर
रो
पड़े
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Prashant Sharma Daraz
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देश
मेरा
जंग
तो
जीता
मगर
लौट
कर
आया
नहीं
बेटा
मेरा
Divy Kamaldhwaj
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वो
जंग
जिस
में
मुक़ाबिल
रहे
ज़मीर
मिरा
मुझे
वो
जीत
भी
'अंबर'
न
होगी
हार
से
कम
Ambreen Haseeb Ambar
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जो
दोस्त
हैं
वो
माँगते
हैं
सुलह
की
दु'आ
दुश्मन
ये
चाहते
हैं
कि
आपस
में
जंग
हो
Lala Madhav Ram Jauhar
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हो
रही
थी
जंग
उसके
नाम
पर
और
वो
ही
मेरे
दुश्मनों
के
काम
आया
Shashank Shekhar Pathak
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सुलग
रहे
थे
शजर
दिल
तमाम
भँवरों
के
दिल
अपना
वार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
बहुत
मलाल
हुआ
देखकर
गुलिस्ताँ
में
तमाचा
मार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
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Shajar Abbas
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आख़िरी
जंग
मैं
लड़ने
के
लिए
निकला
हूँ
फिर
रहे
या
न
रहे
तेरा
दिवाना
आना
Mubarak Siddiqi
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चाहत
ने
ला
के
छोड़ा
है
ऐसे
मुका़म
पर
मैं
भी
उदास
वो
भी
परेशाँ
है
आज
कल
उस
के
भी
रुख़
का
रंग
ज़रा
ज़र्द-ज़र्द
है
अपना
भी
तार-तार
गिरेबाँ
है
आज
कल
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Shadab Shabbiri
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तू
नहीं
है
तो
मा-सिवा
तेरे
और
क्या
ख़ाक
इस
मकान
में
है
Shadab Shabbiri
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जिसे
ज़िन्दगी
आप
कहते
हैं
उसकी
हक़ीक़त
में
कोई
हक़ीक़त
नहीं
है
Shadab Shabbiri
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झूठ
जो
जितना
बोल
ले
बढ़कर
हाँ
वही
शख़्स
मो'तबर
है
अब
Shadab Shabbiri
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हम
जहाँ
थे
वहाँ
से
ग़ाएब
हैं
तुम
जहाँ
थे
वहाँ
पे
हो
कि
नहीं
Shadab Shabbiri
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