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Shadab Shabbiri
mujh se hai mohabbat to zaraa ghar bhi aaiye
mujh se hai mohabbat to zaraa ghar bhi aaiye | मुझ से है मोहब्बत तो ज़रा घर भी आइए
- Shadab Shabbiri
मुझ
से
है
मोहब्बत
तो
ज़रा
घर
भी
आइए
ये
क्या?कि
मुहल्ले
से
गुज़र
जाइए
चुपचाप
- Shadab Shabbiri
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घर
में
झीने
रिश्ते
मैंने
लाखों
बार
उधड़ते
देखे
चुपके
चुपके
कर
देती
है
जाने
कब
तुरपाई
अम्मा
Aalok Shrivastav
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हमारे
घर
के
रिश्तों
में
अभी
बारीकियाँ
कम
हैं
भतीजा
मार
खाता
है
तो
चाचा
बोल
देते
हैं
Nirbhay Nishchhal
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सब
कुछ
तो
है
क्या
ढूँडती
रहती
हैं
निगाहें
क्या
बात
है
मैं
वक़्त
पे
घर
क्यूँँ
नहीं
जाता
Nida Fazli
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मौत
न
आई
तो
'अल्वी'
छुट्टी
में
घर
जाएँगे
Mohammad Alvi
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गुमान
है
या
किसी
विश्वास
में
है
सभी
अच्छे
दिनों
की
आस
में
है
ये
कैसा
जश्न
है
घर
वापसी
का
अभी
तो
राम
ही
वनवास
में
है
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Azhar Iqbal
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रोज़
ढक
लेती
थी
नीला
जिस्म
अपना
शुक्र
है
आ
गई
बाहर
घर
की
बातें
Parul Singh "Noor"
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उस
को
रुख़्सत
तो
किया
था
मुझे
मालूम
न
था
सारा
घर
ले
गया
घर
छोड़
के
जाने
वाला
Nida Fazli
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जिसे
तुम
काट
आए
उस
शजर
को
ढूँढता
होगा
परिंदा
लौटकर
के
अपने
घर
को
ढूँढता
होगा
Bhaskar Shukla
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इक
दिए
से
एक
कमरा
भी
बहुत
है
दिल
जलाने
से
ये
घर
रौशन
हुआ
है
Neeraj Neer
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ज़मीं
पे
घर
बनाया
है
मगर
जन्नत
में
रहते
हैं
हमारी
ख़ुश-नसीबी
है
कि
हम
भारत
में
रहते
हैं
Mehshar Afridi
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तिरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
मैं
हाल-ए-दिल
सुनाना
चाहता
हूँ
तुझे
अपना
बनाना
चाहता
हूँ
मैं
जीने
का
बहाना
चाहता
हूँ
यहीं
कश्ती
जलाना
चाहता
हूँ
हुकूमत
फ़ातिहाना
चाहता
हूँ
मैं
इक
दर्पण
दिखाना
चाहता
हूँ
तुझे
तुझ
से
मिलाना
चाहता
हूँ
फ़साने
को
हक़ीक़त
में
बदल
कर
हक़ीक़त
सा
फ़साना
चाहता
हूँ
ठिकाने
तो
कई
मिल
जाएँ
लेकिन
तिरे
दिल
में
ठिकाना
चाहता
हूँ
ज़रा
कुछ
और
मोहलत
दे
मुझे
तू
मैं
हर
वा'दा
निभाना
चाहता
हूँ
मिरे
अश'आर
रूमानी
हैं
लेकिन
मैं
तेवर
बाग़ियाना
चाहता
हूँ
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Shadab Shabbiri
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ज़मीं
नीचे
न
ऊपर
आसमाँ
है
कहाँ
हम
लोग
लाए
जा
रहे
हैं
Shadab Shabbiri
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कभी
लगते
गले
से
वो
कभी
सरगोशियाँ
करते
कभी
नज़रें
झुकाते
और
शरमाते
तो
अच्छा
था
Shadab Shabbiri
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हिज्र
की
रात
शाइरों
वाली
फिर
वही
बात
शाइरों
वाली
Shadab Shabbiri
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दह्र
की
बस
यहीं
हक़ीक़त
है
कुछ
नहीं
है
यहाँ
हक़ीक़त
में
Shadab Shabbiri
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