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Shadab Shabbiri
hamne yahiin parhe the mohabbat ke chaar harf
hamne yahiin parhe the mohabbat ke chaar harf | हमने यहीं पढ़े थे मोहब्बत के चार हर्फ़
- Shadab Shabbiri
हमने
यहीं
पढ़े
थे
मोहब्बत
के
चार
हर्फ़
सीखा
था
ज़िन्दगी
का
क़रीना
इसी
जगह
- Shadab Shabbiri
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बिछड़
कर
मुझ
सेे
तुझको
क्या
मिला
है
कि
जो
कुछ
था
वो
भी
खोना
पड़ा
है
गया
था
जिस
जगह
पर
छोड़
कर
तू
उसी
रस्ते
पे
दिल
अब
भी
खड़ा
है
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ATUL SINGH
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दिल
की
तमन्ना
थी
मस्ती
में
मंज़िल
से
भी
दूर
निकलते
अपना
भी
कोई
साथी
होता
हम
भी
बहकते
चलते
चलते
Majrooh Sultanpuri
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सिर्फ़
उस
के
होंट
काग़ज़
पर
बना
देता
हूँ
मैं
ख़ुद
बना
लेती
है
होंटों
पर
हँसी
अपनी
जगह
Anwar Shaoor
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आपने
मुझको
डुबोया
है
किसी
और
जगह
इतनी
गहराई
कहाँ
होती
है
दरिया
में
Tehzeeb Hafi
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चले
चलिए
कि
चलना
ही
दलील-ए-कामरानी
है
जो
थक
कर
बैठ
जाते
हैं
वो
मंज़िल
पा
नहीं
सकते
Hafeez Banarasi
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तू
उसके
दिल
में
जगह
चाहता
है
यार
जो
शख़्स
किसी
को
देता
नहीं
अपने
साथ
वाली
जगह
Umair Najmi
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मंज़िल
मिली
तो
उसकी
कमी
हमको
खा
गई
सामान
रास्ते
में
जो
खोना
पड़ा
हमें
Abbas Qamar
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धोखा
है
इक
फ़रेब
है
मंज़िल
का
हर
ख़याल
सच
पूछिए
तो
सारा
सफ़र
वापसी
का
है
Rajesh Reddy
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'फ़ैज़'
थी
राह
सर-ब-सर
मंज़िल
हम
जहाँ
पहुँचे
कामयाब
आए
Faiz Ahmad Faiz
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सब
कर
लेना
लम्हे
ज़ाया'
मत
करना
ग़लत
जगह
पर
जज़्बे
ज़ाया'
मत
करना
Ali Zaryoun
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शौक़-ए-मंज़िल
में
चलता
रहता
हूँ
पड़ता
रहता
है
आबला
दिल
में
Shadab Shabbiri
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जाने
कब
होगा
दुबारा
यहाँ
आना
जानाँ
आ
इधर
बैठ
अभी
छोड़
बहाना
जानाँ
Shadab Shabbiri
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जवानी
की
मुहब्बत
पर
नज़र
रहती
है
दुनिया
की
बुढ़ापे
की
मुहब्बत
में
कोई
ख़तरा
नहीं
होता
Shadab Shabbiri
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डर
गया
हूँ
मैं
यार
अंदर
से
कम
निकलता
हूँ
इस
लिए
घर
से
जाने
क्या
कुछ
गिरा
था
ऊपर
से
इक
बला
थी
जो
टल
गई
सर
से
जो
बराबर
नहीं
मिला
करता
आज
गुज़रा
मिरे
बराबर
से
बस
यही
सोच
कर
पड़ा
हूँ
मैं
कुछ
तो
मिलना
ही
है
तिरे
दर
से
हक़
बयानी
है
शा'इरी
मेरी
शा'इरी
छोड़
दूँ
तिरे
डर
से
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Shadab Shabbiri
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वो
मिरी
सम्त
उछालेगा
खिलौने
शादाब
और
हम
उस
सेे
बहल
जाएँगे
उम्मीद
न
थी
Shadab Shabbiri
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