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Shadab Shabbiri
gar tira dar nahin mila hota
gar tira dar nahin mila hota | गर तिरा दर नहीं मिला होता
- Shadab Shabbiri
गर
तिरा
दर
नहीं
मिला
होता
ऐ
ख़ुदा
दर-बदर
गए
होते
- Shadab Shabbiri
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दीवार-ओ-दर
पे
'कृष्णा'
की
लीला
के
नक़्श
है
मंदिर
है
ये
तो
'कृष्ण'
के
दरबार
की
तरह
Shobha Kukkal
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फ़ुर्सत
नहीं
मुझे
कि
करूँँ
इश्क़
फिर
से
अब
माज़ी
की
चोटों
से
अभी
उभरा
नहीं
हूँ
मैं
डर
है
कहीं
ये
ऐब
उसे
रुस्वा
कर
न
दे
सो
ग़म
में
भी
शराब
को
छूता
नहीं
हूँ
मैं
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Harsh saxena
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कुछ
न
था
मेरे
पास
खोने
को
तुम
मिले
हो
तो
डर
गया
हूँ
मैं
Nomaan Shauque
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मेरे
ही
संग-ओ-ख़िश्त
से
तामीर-ए-बाम-ओ-दर
मेरे
ही
घर
को
शहर
में
शामिल
कहा
न
जाए
Majrooh Sultanpuri
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वही
मंज़िलें
वही
दश्त
ओ
दर
तिरे
दिल-ज़दों
के
हैं
राहबर
वही
आरज़ू
वही
जुस्तुजू
वही
राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ
Noon Meem Rashid
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गुज़ार
देते
हैं
रातें
पहलू
में
उसके
जुगनू
को
भी
दर
का
फ़क़ीर
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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इस
दर
का
हो
या
उस
दर
का
हर
पत्थर
पत्थर
है
लेकिन
कुछ
ने
मेरा
सर
फोड़ा
हैं
कुछ
पर
मैं
ने
सर
फोड़ा
है
Zubair Ali Tabish
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नई
सुब्ह
पर
नज़र
है
मगर
आह
ये
भी
डर
है
ये
सहर
भी
रफ़्ता
रफ़्ता
कहीं
शाम
तक
न
पहुँचे
Shakeel Badayuni
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तुम
पर
इक
दिन
मरते
मरते
मर
जाना
है,
दीवाने
को
कहाँ
ख़बर
है
घर
जाना
है
एक
शब्द
तुमको
अंधेरे
का
ख़ौफ़
दिलाकर,
बाद
में
ख़ुद
भी
जान
बूझकर
डर
जाना
है
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Vishal Singh Tabish
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राम
होने
में
या
रावण
में
है
अंतर
इतना
एक
दुनिया
को
ख़ुशी
दूसरा
ग़म
देता
है
हम
ने
रावण
को
बरस
दर
बरस
जलाया
है
कौन
है
वो
जो
इसे
फिर
से
जनम
देता
है
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Kumar Vishwas
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आग
से
खेलने
की
उम्र
में
तुम
बर्फ़
से
खेलते
हो
हैरत
है
Shadab Shabbiri
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दर्द
से
वो
भला
भरा
सा
है
ज़ख़्म
जैसे
नया
नया
सा
है
Shadab Shabbiri
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हिज्र
की
रात
शाइरों
वाली
फिर
वही
बात
शाइरों
वाली
Shadab Shabbiri
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रहने
लगा
हूँ
मैं
भी
किसी
की
निगाह
में
शुक्रे-ख़ुदाए-पाक
कि
बे-घर
नहीं
रहा
Shadab Shabbiri
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मुझ
से
है
मोहब्बत
तो
ज़रा
घर
भी
आइए
ये
क्या?कि
मुहल्ले
से
गुज़र
जाइए
चुपचाप
Shadab Shabbiri
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