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Surendra Bhatia "Salil"
baad muddat ke ab mili ho tum
baad muddat ke ab mili ho tum | बाद मुद्दत के अब मिली हो तुम
- Surendra Bhatia "Salil"
बाद
मुद्दत
के
अब
मिली
हो
तुम
और
थोड़ा
सा
खिल
गई
हो
तुम
फिर
से
सत्रह
का
हो
गया
हूँ
मैं
फिर
से
सत्रह
की
हो
गई
हो
तुम
पाक
नापाक
की
जिरह
से
परे
मुझ
से
मुझ
सी
ही
फिर
मिली
हो
तुम
सारी
दुनिया
ये
क्या
है
धोखा
है
एक
बस
मैं
या
इक
खरी
हो
तुम
मिल
के
हम
हम
कहाँ
रहे
हैं
अब
मैं
सुख़न-वर
हूँ
शा'इरी
हो
तुम
- Surendra Bhatia "Salil"
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चंद
लम्हें
ज़िन्दगी
जीने
को
भी
मुद्दतों
तक
ज़िंदा
दिखना
पड़ता
है
घर
पे
कुछ
शा
में
बिताने
के
लिए
दिन
महीनों
कोड
लिखना
पड़ता
है
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बे-कार
हो
जाते
हैं
इसी
काम
के
बाद
कुछ
याद
नहीं
रहता
तेरे
नाम
के
बाद
तन्हा
कहाँ
रह
पाते
हैं
अब
शामों
में
यार
तन्हाई
भी
तो
आती
है
हर
शाम
के
बाद
बोसा
दिया
था
उसने
फ़क़त
एक
ही
बार
बेगार
लगे
है
उसी
इन'आम
के
बाद
तो
इनसे
मुहब्बत
में
जुनूँ
की
है
तलाश
ये
लड़के
पसर
जाते
हैं
इक
जाम
के
बाद
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मुझे
बाहरस
देखो
सब
नया
है
मगर
भीतर
पुराना
मसअला
है
मैं
ख़ामोशी
के
रौले
से
हूँ
आजिज़
ये
मेरे
कान
में
चुभने
लगा
है
तुम्हीं
से
पूछ
कर
देंगे
दग़ा
भी
तुम्हारे
साथ
ऐसा
राब्ता
है
कहानी
ख़त्म
कर
के
आ
रहा
हूँ
पर
इक
किरदार
अंदर
रह
गया
है
नहीं
देखा
है
ख़ुद
का
ख़ुद
सा
दुश्मन
मुझे
ख़तरा
ही
अपने
आप
का
है
चले
जाएँगे
तेरी
बज़्म
से
भी
यहाँ
तेरे
सिवा
अब
क्या
बचा
है
यक़ीनन
मौत
की
आग़ोश
है
ये
कोई
ज़िंदा
सुकूँ
से
सो
सका
है
कुएँ
में
पाँव
डाले
हैं
'सलिल'
और
कहाँ
डूबूँ
ये
मुझ
से
पूछता
है
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तरन्नुम
साज़
का
मेरे
उसे
नासाज़
लगता
है
मेरी
ख़ामोशियों
में
भी
उसे
इक
राज़
लगता
है
ख़ुदा
अब
बख़्श
भी
दे
दिल
को
मेरे
उल्फ़तें
उसकी
तुझे
भी
रास
आता
उसका
ही
अंदाज़
लगता
है
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समय
की
चिमनियों
से
कहकशाँ
सा
निकला
है
जलन
सीने
में
करता
कुछ
धुआँ
सा
निकला
है
वो
कल
इक
काग़ज़ी
कश्ती
का
तन्हा
माँझी
था
सुना
है
आज
उसका
कारवाँ
सा
निकला
है
अना
को
रात
दिन
हथियाए
बैठा
था
मेरे
अभी
देखा
तो
उसका
इक
मकाँ
सा
निकला
है
मुझे
जिस
लम्हा
उसकी
याद
आती
है
सलिल
लगे
आँखों
से
जैसे
कुछ
रवाँ
सा
निकला
है
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