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Surendra Bhatia "Salil"
be-kaar ho jaate hain isi kaam ke baad
be-kaar ho jaate hain isi kaam ke baad | बे-कार हो जाते हैं इसी काम के बाद
- Surendra Bhatia "Salil"
बे-कार
हो
जाते
हैं
इसी
काम
के
बाद
कुछ
याद
नहीं
रहता
तेरे
नाम
के
बाद
तन्हा
कहाँ
रह
पाते
हैं
अब
शामों
में
यार
तन्हाई
भी
तो
आती
है
हर
शाम
के
बाद
बोसा
दिया
था
उसने
फ़क़त
एक
ही
बार
बेगार
लगे
है
उसी
इन'आम
के
बाद
तो
इनसे
मुहब्बत
में
जुनूँ
की
है
तलाश
ये
लड़के
पसर
जाते
हैं
इक
जाम
के
बाद
- Surendra Bhatia "Salil"
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उसने
जिस
दिन
से
मुझको
खोया
है
फिर
कभी
चैन
से
न
सोया
है
तुम
जिसे
सोच
भी
नहीं
सकते
रोज़
यादों
में
मेरी
रोया
है
ज़िन्दगी
भर
फलेगा
इश्क़
इस
पर
बीज
मैंने
भी
ऐसा
बोया
है
मेरे
हाथों
पे
इतनी
कालिख
है
'आदतन
कोई
ज़ख़्म
धोया
है
जिसने
बस्ता
उठाना
था
उसने
ज़िन्दगी
तेरा
भार
ढोया
है
तू
ही
तन्हा
नहीं
मोहब्बत
ने
मेरा
तकिया
भी
तो
भिगोया
है
आँख
मूँदे
'सलिल'
सुकूँ
में
है
बाद
मुद्दत
के
आज
सोया
है
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आँख
में
मोती
दबा
कर
सो
जाते
हैं
हाथ
का
तकिया
बना
कर
सो
जाते
हैं
घर
से
इतनी
दूर
माँ
की
यादें
लिए
ख़ुद
ही
ख़ुद
को
थपथपा
कर
सो
जाते
हैं
ख़्वाब
चुभते
हैं
तो
उठते
हैं
चौंक
कर
और
फिर
से
कसमसा
कर
सो
जाते
हैं
सोचते
हैं
हम
से
तो
बेहतर
हैं
शजर
जागते
है
लहलहा
कर
सो
जाते
हैं
सुब्ह
होते
भागते
हैं
ग़म
से
परे
रात
उसके
पास
जाकर
सो
जाते
हैं
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वो
कहती
है
कि
लाखों
हैं
मगर
शायर
नहीं
तुम
सा
सलिल
तुम
बात
भी
कह
दो
ग़ज़ल
मालूम
होती
है
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मुझे
बाहरस
देखो
सब
नया
है
मगर
भीतर
पुराना
मसअला
है
मैं
ख़ामोशी
के
रौले
से
हूँ
आजिज़
ये
मेरे
कान
में
चुभने
लगा
है
तुम्हीं
से
पूछ
कर
देंगे
दग़ा
भी
तुम्हारे
साथ
ऐसा
राब्ता
है
कहानी
ख़त्म
कर
के
आ
रहा
हूँ
पर
इक
किरदार
अंदर
रह
गया
है
नहीं
देखा
है
ख़ुद
का
ख़ुद
सा
दुश्मन
मुझे
ख़तरा
ही
अपने
आप
का
है
चले
जाएँगे
तेरी
बज़्म
से
भी
यहाँ
तेरे
सिवा
अब
क्या
बचा
है
यक़ीनन
मौत
की
आग़ोश
है
ये
कोई
ज़िंदा
सुकूँ
से
सो
सका
है
कुएँ
में
पाँव
डाले
हैं
'सलिल'
और
कहाँ
डूबूँ
ये
मुझ
से
पूछता
है
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वही
जज़्बा-ए-साहिल
तोड़ने
को
लश्कर-ए-मौजाँ
समुंदर
तुझ
से
तो
कुछ
और
ही
उम्मीद
थी
मुझको
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