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Sakshi Saraswat
mere zaKHmon ki sargam ko hawaon ne sameta hai
mere zaKHmon ki sargam ko hawaon ne sameta hai | मेरे ज़ख़्मों की सरगम को हवाओं ने समेटा है
- Sakshi Saraswat
मेरे
ज़ख़्मों
की
सरगम
को
हवाओं
ने
समेटा
है
कोई
छू
कर
गुज़रता
है
उसे
बरखा
समझता
है
मैं
तुमको
कह
तो
देती
ग़म
मेरा,
मेरी
ये
बेचैनी
मगर
तुम
में,
यहाँ
सब
में
मुझे
अब
फ़र्क
लगता
है
जो
तन्हा
है
वो
तन्हाई
के
क़िस्सों
को
नहीं
गाता
जो
महशर
में
दबा
जज़्बों
को
बैठा
है
वो
तन्हा
है
~साक्षी
सारस्वत
- Sakshi Saraswat
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तन्हा
ही
सही
लड़
तो
रही
है
वो
अकेली
बस
थक
के
गिरी
है
अभी
हारी
तो
नहीं
है
Ali Zaryoun
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आँख
में
पानी
रखो,
होंटों
पे
चिंगारी
रखो
ज़िंदा
रहना
है
तो
तरकीबें
बहुत
सारी
रखो
Rahat Indori
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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इस
का
अपनी
ही
रवानी
पर
नहीं
है
इख़्तियार
ज़िंदगी
शिव
की
जटाओं
में
है
गंगा
की
तरह
Ayush Charagh
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पहले
पानी
को
और
हवा
को
बचाओ
ये
बचा
लो
तो
फिर
ख़ुदा
को
बचाओ
Swapnil Tiwari
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ये
काम
दोनों
तरफ़
हुआ
है
उसे
भी
आदत
पड़ी
है
मेरी
Shariq Kaifi
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जब
तक
जला
ये
हम
भी
जले
इसके
साथ
साथ
जब
बुझ
गया
चराग़
तो
सोना
पड़े
हमें
Abbas Qamar
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तकल्लुफ़
छोड़कर
आओ
उसे
फिर
से
जिया
जाए
हमारा
बचपना
जो
एल्बमों
में
क़ैद
रहता
है
Shiva awasthi
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किनारे
दो
मिलाने
में
हैं
कितनी
मुश्किलें
सोचो
ये
पुल
दिन
भर
ही
सीने
पे
बिचारा
चोट
खाता
है
Prashant Beybaar
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किस
तरह
मेरी
जान
ये
किरदार
बने
है
जो
तुझ
सेे
मिले
है
वो
तेरा
यार
बने
है
Vikram Gaur Vairagi
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मेरी
ग़ज़लों
में
लोगों
को
सदा
दिखती
है
तुकबंदी
मगर
पन्नों
पे
बहते
अश्क़
पढ़
लेती
हैं
दीवारें
Sakshi Saraswat
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सभी
ग़ज़लों
के
साए
में
हमेशा
ग़म
बताती
हूँ
कि
जिन
बातों
से
जीती
थी
वो
हो
बेदम
बताती
हूँ
जिसे
अब
याद
कर
शब
भर
तड़पती
हूँ
सिसकती
हूँ
उसी
की
याद
को
मैं
सुब्ह
फिर
मरहम
बताती
हूँ
वो
जिसका
ज़िक्र
हो
जाने
से
मुझको
हो
रही
उलझन
मगर
उसकी
ही
बातें
हर
घड़ी
हरदम
बताती
हूँ
कि
ये
जो
सामने
है
शख़्स
पर
अंजान
लगता
है
इसी
सूरत
से
मिलते
शख़्स
को
हमदम
बताती
हूँ
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Sakshi Saraswat
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मैं
बेमतलब
सा
इश्क़
निभाना
चाहती
हूँ
उसकी
बातों
से
नज़्म
चुराना
चाहती
हूँ
Sakshi Saraswat
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ये
हर
शब
की
कहानी
है
मुझे
सब
से
छुपानी
है
मैं
ख़ुद
तक
रख
भी
लूँ
लेकिन
मेरी
आँखों
में
पानी
है
अगर
वो
पूछ
लेता
तो
ज़रा
राहत
मिली
होती
वो
कह
कर
के
गया
है
फिर
वही
आदत
पुरानी
है
जो
शामों
में
बहकती
है
जो
सुब्हों
में
चहकती
है
जो
इक
पल
में
बिख़र
जाए
वही
तो
ज़िंदगानी
है
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Sakshi Saraswat
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थोड़ी
सिसकी
थोड़ी
ठिठकी
पागल
होना
अच्छा
है
जग
की
गाथा
गाने
वाले
तेरा
रोना
अच्छा
है
Sakshi Saraswat
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