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Sakshi Saraswat
main jab ghar thii to raahat thii badaa mahfooz kona tha
main jab ghar thii to raahat thii badaa mahfooz kona tha | मैं जब घर थी तो राहत थी बड़ा महफ़ूज़ कोना था
- Sakshi Saraswat
मैं
जब
घर
थी
तो
राहत
थी
बड़ा
महफ़ूज़
कोना
था
मैं
अब
भी
हॅंस
के
चलती
हूॅं
जहाँ
जी
भर
के
रोना
था
जहाँ
भर
से
शिकायत
थी
मुझे
तेरा
भरोसा
था
अभी
लगने
लगा
है
तुझ
को
पाना
ख़ुद
को
खोना
था
सभी
राहों
पे
चलकर
अब
मुझे
महसूस
होता
है
जो
होना
है
वो
होता
है
जो
होता
है
वो
होना
था
- Sakshi Saraswat
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ऐ
जज़्बा-ए-दिल
गर
मैं
चाहूँ
हर
चीज़
मुक़ाबिल
आ
जाए
मंज़िल
के
लिए
दो
गाम
चलूँ
और
सामने
मंज़िल
आ
जाए
Behzad Lakhnavi
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इस
क़दर
हम
ख़ुश
रखेंगे
आपको
ससुराल
में
आपको
महसूस
होगा
जी
रहे
ननिहाल
में
दो
गुलाबों
की
तरह
है
दो
चमेली
की
तरह
फ़र्क़
बस
इतना
तुम्हारे
होंठ
में
और
गाल
में
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Tanoj Dadhich
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जब
ज़रा
रात
हुई
और
मह
ओ
अंजुम
आए
बार-हा
दिल
ने
ये
महसूस
किया
तुम
आए
Asad Bhopali
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रोज़
मिलने
पे
भी
लगता
था
कि
जुग
बीत
गए
इश्क़
में
वक़्त
का
एहसास
नहीं
रहता
है
Ahmad Mushtaq
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इसी
लिए
हमें
एहसास-ए-जुर्म
है
शायद
अभी
हमारी
मोहब्बत
नई
नई
है
ना
Afzal Khan
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साँस
लेती
हूँ
तो
यूँँ
महसूस
होता
है
मुझे
जैसे
मेरे
दिल
की
हर
धड़कन
में
शामिल
आप
हैं
Jaan Nisar Akhtar
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अपनी
हालत
का
ख़ुद
एहसास
नहीं
है
मुझ
को
मैं
ने
औरों
से
सुना
है
कि
परेशान
हूँ
मैं
Aasi Uldani
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लम्स
उसका
इस
क़दर
महसूस
होता
है
मुझे
हो
कोई
नाराज़
तितली
फूल
पर
बैठी
हुई
फ़िल्म
में
शायद
बिछड़ने
का
कोई
अब
सीन
है
और
मेरे
हाथ
को
वो
थाम
कर
बैठी
हुई
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Sunny Seher
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यार
इस
में
तो
मज़ा
है
ही
नहीं
कोई
भी
हम
सेे
ख़फ़ा
है
ही
नहीं
इश्क़
ही
इश्क़
है
महसूस
करो
और
कुछ
इसके
सिवा
है
ही
नहीं
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Madhyam Saxena
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उसे
महसूस
भी
होने
न
दूँगा
कि
उसके
प्यार
में
मैं
मर
चुका
हूँ
Umesh Maurya
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ये
हर
शब
की
कहानी
है
मुझे
सब
से
छुपानी
है
मैं
ख़ुद
तक
रख
भी
लूँ
लेकिन
मेरी
आँखों
में
पानी
है
अगर
वो
पूछ
लेता
तो
ज़रा
राहत
मिली
होती
वो
कह
कर
के
गया
है
फिर
वही
आदत
पुरानी
है
जो
शामों
में
बहकती
है
जो
सुब्हों
में
चहकती
है
जो
इक
पल
में
बिख़र
जाए
वही
तो
ज़िंदगानी
है
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Sakshi Saraswat
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हमारे
दर्मियां
कुछ
था
नहीं
जग
में
नुमाइश
थी
तेरे
जाने
पे
फिर
क्यूँँ
दिल
मेरा
नासूर
होता
है
Sakshi Saraswat
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ये
बेबाकी
कहो
या
कह
दो
इसको
भारी
लाचारी
सभी
हसरत
के
ऊपर
है
हमेशा
मेरी
ख़ुद्दारी
भले
ख़ंजर
मिले
हर
दर
पे
सारे
ग़म
मुबारक
हो
मुहब्बत
से
सलामत
हो
हमेशा
दिल
की
अलमारी
चले
आते
हैं
फिर
उस
राह
पर
हम
होने
को
रुस्वा
जो
मिटने
पर
भी
चलती
है
ये
है
संगीन
बीमारी
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Sakshi Saraswat
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मेरे
ज़ख़्मों
की
सरगम
को
हवाओं
ने
समेटा
है
कोई
छू
कर
गुज़रता
है
उसे
बरखा
समझता
है
मैं
तुमको
कह
तो
देती
ग़म
मेरा,
मेरी
ये
बेचैनी
मगर
तुम
में,
यहाँ
सब
में
मुझे
अब
फ़र्क
लगता
है
जो
तन्हा
है
वो
तन्हाई
के
क़िस्सों
को
नहीं
गाता
जो
महशर
में
दबा
जज़्बों
को
बैठा
है
वो
तन्हा
है
~साक्षी
सारस्वत
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Sakshi Saraswat
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मेरे
दिल
पर
तेरी
इस
तरह
हुकूमत
हो
जैसे
कजरे
को
बस
आँखों
की
ज़रूरत
हो
इक
शाइर
से
जन्नत
जा
के
कहना
है
ये
देखो
मर
ही
जाऊँ
जो
तुम
सेे
फ़ुर्सत
हो
सबने
उसको
देखा
है
ग़ैर
की
बाहों
में
शायद
उस
चेहरे
में
भी
मेरी
सूरत
हो
अब
जब
मिलती
हूँ
ख़ुद
से
हँस
के
मिलती
हूँ
हो
सकता
है
अगले
पल
ख़ुद
से
फ़ुर्क़त
हो
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Sakshi Saraswat
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