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Amaan Javed
'aashiq ka intizaar tha duaon ki tarah
'aashiq ka intizaar tha duaon ki tarah | 'आशिक़ का इंतिज़ार था दु'आओं की तरह
- Amaan Javed
'आशिक़
का
इंतिज़ार
था
दु'आओं
की
तरह
महबूब
चुप
रहा
मगर
ख़ुदाओं
की
तरह
- Amaan Javed
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ये
सोच
कर
के
कि
उसने
किया
है
याद
मुझे
मैं
मेरी
उँगलियों
पे
हिचकियों
को
गिनता
रहा
पलट
के
उसने
कराया
न
मुझको
चुप
लेकिन
तमाम
रात
मेरी
सिसकियों
को
गिनता
रहा
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Dipendra Singh 'Raaz'
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तेरे
चुप
रहने
से
हर
पौधा
सूख
गया
है
तुझको
मालूम
नहीं
पौधों
का
पानी
है
तू
Kabir Altamash
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तेरा
चुप
रहना
मेरे
ज़ेहन
में
क्या
बैठ
गया
इतनी
आवाज़ें
तुझे
दीं
कि
गला
बैठ
गया
Tehzeeb Hafi
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क्या
ख़ूब
तुम
ने
ग़ैर
को
बोसा
नहीं
दिया
बस
चुप
रहो
हमारे
भी
मुँह
में
ज़बान
है
Mirza Ghalib
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हर
एक
बात
को
चुप-चाप
क्यूँँ
सुना
जाए
कभी
तो
हौसला
कर
के
'नहीं'
कहा
जाए
Nida Fazli
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मेरे
होंटों
पे
ख़ामुशी
है
बहुत
इन
गुलाबों
पे
तितलियाँ
रख
दे
Shakeel Azmi
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मुझ
में
रहते
हैं
करोड़ों
लोग
चुप
कैसे
रहूँ
हर
ग़ज़ल
अब
सल्तनत
के
नाम
एक
बयान
है
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Dushyant Kumar
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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बुरा
मनाया
था
हर
आहट
हर
सरगोशी
का
सोचो
कितना
ध्यान
रखा
उसने
ख़ामोशी
का
तुम
इसका
नुक़सान
बताती
अच्छी
लगती
हो
वरना
हम
को
शौक़
नहीं
है
सिगरेट-नोशी
का
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Khurram Afaq
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उस
की
बेचैनी
बढ़ाना
चाहती
हूँ
सुनिए
कह
कर
चुप
लगाना
चाहती
हूँ
Pooja Bhatia
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कोई
तो
है
जो
मेरे
कान
में
ये
कह
गया
है
तू
अपनी
राह
में
दीवार
बन
के
रह
गया
है
Amaan Javed
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टूटे
हुए
तारे
मेरी
खिड़की
से
गुज़रना
इक
बात
को
करना
है
मुक़द्दर
के
हवाले
Amaan Javed
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मुझे
इतनी
मुहब्बत
हो
चुकी
है
कि
मिल
पाने
की
हिम्मत
खो
गई
है
मेरा
दिल
है
अमावस
का
अँधेरा
तुम्हारी
याद
जैसे
चाँदनी
है
मैं
तुम
से
ले
सकूँ
कोई
इजाज़त
मुझे
इतनी
इजाज़त
कब
मिली
है
मिटा
दे
वहशतों
को
ज़िंदगी
से
तुम्हारे
हुस्न
में
वो
ताज़गी
है
मेरी
आँखों
को
ठंडक
दे
गई
है
तेरी
मुस्कान
में
जो
चाँदनी
है
तुम्हें
तो
हक़
भी
है
सब
भूलने
का
मेरा
तो
याद
करना
लाज़मी
है
जो
सब
कुछ
चाहिए
था
पा
लिया
है
मगर
तेरी
कसक
तो
रह
गई
है
तुम्हारा
दिल
अगर
अब
भी
न
पिघले
तो
फिर
किस
काम
की
ये
शा'इरी
है
मुझे
मालूम
है
तुम
क्या
कहोगी
ज़रा
सा
वाह
लिखना
बेरुख़ी
है
तेरा
होना
तेरा
मिलना
ग़ज़ब
है
ये
सब
महसूस
करना
जादुई
है
मुझे
ये
रात
छोटी
लग
रही
है
ग़ज़ल
ये
लंबी
होती
जा
रही
है
-अमान
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Amaan Javed
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पूरी
तरह
वो
और
किसी
के
न
बन
सके
जो
लोग
तेरे
प्यार
से
महरूम
रह
गए
Amaan Javed
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बड़े
हो
कर
समझदारी
तो
मुझको
आ
गई
लेकिन
वो
लड़का
खो
गया
जो
ख़ुशबुओं
से
बात
करता
था
Amaan Javed
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