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Saahir
mahlon ke baashindon ne kab baahar ye dekha hai
mahlon ke baashindon ne kab baahar ye dekha hai | महलों के बाशिंदों ने कब बाहर ये देखा है
- Saahir
महलों
के
बाशिंदों
ने
कब
बाहर
ये
देखा
है
बस्ती
की
पगडंडी
पर
कितने
आदम
पड़े
हुए
हैं
जिन
जिन
लोगों
ने
शिरकत
की
है
मेरी
मय्यत
में
देखोगे
तो
जानोगे
सब
बन्दे
मरे
हुए
हैं
- Saahir
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पानी
आँख
में
भरकर
लाया
जा
सकता
है
अब
भी
जलता
शहर
बचाया
जा
सकता
है
Abbas Tabish
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ऊँचे
नीचे
घर
थे
बस्ती
में
बहुत
ज़लज़ले
ने
सब
बराबर
कर
दिए
Zubair Ali Tabish
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हमने
पर्चे
आँसुओं
से
भर
दिए
और
तुमने
इतने
कम
नंबर
दिए
ऊंचे
नीचे
घर
थे
बस्ती
में
बहुत
जलजले
ने
सब
बराबर
कर
दिए
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Zubair Ali Tabish
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आदत
सी
बना
ली
है
तुमने
तो
'मुनीर'
अपनी
जिस
शहर
में
भी
रहना
उकताए
हुए
रहना
Muneer Niyazi
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धुआँ
जो
कुछ
घरों
से
उठ
रहा
है
न
पूरे
शहर
पर
छाए
तो
कहना
Javed Akhtar
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कोई
हाथ
भी
न
मिलाएगा
जो
गले
मिलोगे
तपाक
से
ये
नए
मिज़ाज
का
शहर
है
ज़रा
फ़ासले
से
मिला
करो
Bashir Badr
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नक़्शा
उठा
के
और
कोई
शहर
देखिए
इस
शहर
में
तो
सब
से
मुलाक़ात
हो
गई
Nida Fazli
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इतनी
शोहरत
तो
मेरी
आज
भी
इस
शहर
में
है
एक
पत्ता
न
हिले
मेरी
इजाज़त
के
बग़ैर
Mukesh Jha
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बदन
लिए
तलाशता
फिरू
हूँ
रात
दिन
उसे
सुना
है
जान
भी
मेरी
कहीं
इसी
शहर
में
है
Bhaskar Shukla
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ये
शहर
वो
है
कि
कोई
ख़ुशी
तो
क्या
देता
किसी
ने
दिल
भी
दुखाया
नहीं
बहुत
दिन
से
Farhat Ehsaas
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बतलाऊँ
क्या
कैसे
करता
हूँ
मैं
याद
तुझे
इक
पायल
है
तेरी
उसको
देखा
करता
हूँ
Saahir
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इक
बदन
की
याद
थी
और
इक
बदन
था
साथ
में
इक
बदन
की
खोज
में
हम
इक
बदन
में
खो
गए
Saahir
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उसको
सहराओं
में
फ़ूल
लगाने
हैं
यानी
चिकनी
स्लेट
पे
दिल
बनवाने
हैं
Saahir
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छू
नहीं
सकते
हैं
शहज़ादी
को
हम
जैसे
कभी
इसलिए
हम
जैसे
करते
हैं
गुज़ारा,
देखकर
Saahir
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मैं
अलकनन्दा
सा
होता
और
वो
मंदाकनी
सी
फिर
कहीं
पर
साथ
मिलते
और
गंगा
होते
जाते
Saahir
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