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Prit
husn kii ik pari hai jaan meri
husn kii ik pari hai jaan meri | हुस्न की इक परी है जान मेरी
- Prit
हुस्न
की
इक
परी
है
जान
मेरी
सो
रक़ीब
आसमान
है
मेरा
- Prit
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बात
अच्छी
लगी
तो
आऊँगा
वरना
मेरे
बदन
से
बात
करें
Prit
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हरारत
कर
कोई,
मैं
तेरे
दिल
में
घर
बना
लूँ
फिर
तेरी
आँखें,
तेरी
मुस्कान,
तेरा
दिल
संवारूँ
फिर
कभी
बे
पैरहन
जब
तू
मेरे
आग़ोश
में
आए
गले
लगकर
मैं,
तेरे
जिस्म
का
नक़्शा
उतारूँ
फिर
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Prit
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उसे
मुझ
सेे
मोहब्बत
है
तभी
तो
हर
दफ़ा
वो
'प्रीत'
परायों
को
मनाने
के
लिए
मुझको
रुलाता
है
Prit
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आज
तो
ख़ुदा
को
भी
बेनक़ाब
करना
है
रे,
उसे
बुलाओ,
उसका
हिसाब
करना
है
आब-ए-चश्म
को
अपने
बहा
के
सागर
में
आज
तो
मुझे
सागर
को
शराब
करना
है
छीनकर
काँसा
उसको
अपना
ताज
देकर
के
उस
फ़कीर
को
भी
मैने
नवाब
करना
है
शा'इरी
बना
कर
सब
को
सुना
के
ऐसे
ही
"प्रीत"
हर
शख़्स
को
मैंने
गुलाब
करना
है
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Prit
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उसने
उलझा
दिया
मोहब्बत
में
वरना
हम
और
जीना
चाहते
थे
Prit
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