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Prit
ek bhi dil nahin tod paaya kabhi
ek bhi dil nahin tod paaya kabhi | एक भी दिल नहीं तोड़ पाया कभी
- Prit
एक
भी
दिल
नहीं
तोड़
पाया
कभी
तू
सुख़न-वर
नहीं
तुझपे
लानत
है
प्रीत
- Prit
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ये
कहते
हो
तिरे
जाने
से
दिल
को
चैन
आएगा
तो
जाता
हूँ,
ख़ुदा
हाफ़िज़!
मगर
तुम
झूठ
कहते
हो
Zubair Ali Tabish
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तिरंगा
दिल
में
है
लबों
पे
हिंदुस्तान
रखता
हूँ
सिपाही
हूँ
हथेली
पे
मैं
अपनी
जान
रखता
हूँ
Shashank Shekhar Pathak
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दिल
में
न
हो
जुरअत
तो
मोहब्बत
नहीं
मिलती
ख़ैरात
में
इतनी
बड़ी
दौलत
नहीं
मिलती
Nida Fazli
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हर
दुख
का
है
इलाज,
उसे
देखते
रहो
सबकुछ
भुला
के
आज
उसे
देखते
रहो
देखा
उसे
तो
दिल
ने
ये
बे-साख़्ता
कहा
छोड़ो
ये
काम
काज
उसे
देखते
रहो
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Aslam Rashid
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वही
शागिर्द
फिर
हो
जाते
हैं
उस्ताद
ऐ
'जौहर'
जो
अपने
जान-ओ-दिल
से
ख़िदमत-ए-उस्ताद
करते
हैं
Lala Madhav Ram Jauhar
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तुम्हारे
ख़त
को
जलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
ये
दिल
बाहर
निकलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
तुम्हारा
फ़ैसला
है
पास
रुकना
या
नहीं
रुकना
मेरी
क़िस्मत
बदलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
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Tanoj Dadhich
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मसअला
फिर
वही
बे-घर
हुए
लोगों
का
है
हम
सभी
दिल
से
निकाले
कहाँ
तक
जाएँगे
Neeraj Neer
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मैं
जब
सो
जाऊँ
इन
आँखों
पे
अपने
होंट
रख
देना
यक़ीं
आ
जाएगा
पलकों
तले
भी
दिल
धड़कता
है
Bashir Badr
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हमने
जिस
मासूम
परी
को
अपने
दिल
की
जाँ
बोला
था
उसने
हमको
धोखा
देकर
और
किसी
को
हाँ
बोला
था
सारे
वादे
भूल
गई
तुम
कोई
बात
नहीं
जानेमन
लेकिन
ये
कैसे
भूली
तुम
मेरी
माँ
को
माँ
बोला
था
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Tanoj Dadhich
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अगर
हमारे
ही
दिल
में
ठिकाना
चाहिए
था
तो
फिर
तुझे
ज़रा
पहले
बताना
चाहिए
था
Shakeel Jamali
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हम
हैं
दरवेश
घर
से
क्या
हमको
हर
कहीं
पर
मिला
ख़ुदा
हमको
दश्त
हो
सहरा
हो
समुंदर
हो
हर
तरफ़
बस
वही
दिखा
हमको
सूफ़ियाना
मिज़ाज
है
अपना
राम
अल्लाह
सब
एक
सा
हमको
हुस्न-ए-यूसुफ़
सियाह
रंग
का
था
सूरत-ए-कृष्ण
में
दिखा
हमको
या
तो
दिल
में
सँभाल
के
रख
प्रीत
या
तेरे
नैनों
से
बहा
हमको
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Prit
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शायद
उसने
कभी
वफ़ा
की
ही
नइँ
जो
ये
कहता
है
आँखें
बोलती
नइँ
किसी
पे
इक
दफ़ा
दिल
आ
जाए
बंदा
क्या
फिर
तो
रब
की
चलती
नइँ
तेरी
ख़ामोशी
भी
सुनी
मैं
ने
तू
ने
आवाज़
भी
मेरी
सुनी
नइँ
घर
से
दफ़्तर
तलक
सफ़र
है
सिर्फ़
मौत
है
जानी
फिर
ये
ज़िंदगी
नइँ
उसको
कैसे
बुरी
लगी
मेरी
बात
बात
भी
वो
कभी
जो
मैं
ने
की
नइँ
उसे
बिन
देखें
देख
लेते
हैं
हम
वो
हमें
देखकर
भी
देखती
नइँ
आप
कुछ
ज़्यादा
अपने
आप
से
हैं
वरना
मुझ
में
तो
कोई
भी
कमी
नइँ
कभी
चुप
रह
के
कितना
कहती
है
कभी
वो
बोलकर
भी
बोलती
नइँ
'प्रीत'
आज़ादी
ऐसी
जैसे
हो
क़ैद
क़ैद
ऐसी
जहाँ
गिरफ़्तगी
नइँ
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Prit
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तू
सिर्फ़
इश्क़
ही
नहीं,
मेरी
दु'आ
भी
था
लगता
है
इसलिए
तू
मुकम्मल
हुआ
नहीं
Prit
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गिनती
के
चार
दिन
हयात
के
हैं
बाक़ी
जितने
बचे
वफ़ात
के
हैं
आपकी
माने
भी
तो
हम
क्यूँँकर
आप
साहिब
कब
अपनी
बात
के
हैं
नाम
मेरा
लिखा
हुआ
है
पर
रंग
मेहँदी
में
और
हाथ
के
हैं
ये
जो
बिस्तर
पे
लाश
हो
रखे
हैं
ये
सभी
गुल
सुहागरात
के
हैं
वो
भले
हैं
तो
होंगे
मुझको
क्या
ये
बुरे
हैं
प
मेरी
ज़ात
के
हैं
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Prit
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ओ
सितमगर
ज़रा
कम
सितम
कर
खा
तरस
मुझ
पे,
थोड़ा
रहम
कर
Prit
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