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Amanpreet singh
mujhe naaraz hone ka yuñ haq to ab nahin shaayad
mujhe naaraz hone ka yuñ haq to ab nahin shaayad | मुझे नाराज़ होने का यूँँ हक़ तो अब नहीं शायद
- Amanpreet singh
मुझे
नाराज़
होने
का
यूँँ
हक़
तो
अब
नहीं
शायद
उसे
मुझ
सेे
कहीं
प्यारी
अना
अपनी
ही
है
यारों
- Amanpreet singh
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तो
डर
रहे
हैं
आप
कहीं
हक़
न
माँग
ले
यानी
कि
सबको
खौफ़
है
औरत
के
नाम
से
Abhishar Geeta Shukla
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मैं
ख़ुद
भी
यार
तुझे
भूलने
के
हक़
में
हूँ
मगर
जो
बीच
में
कम-बख़्त
शा'इरी
है
ना
Afzal Khan
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ज़ालिम
था
वो
और
ज़ुल्म
की
आदत
भी
बहुत
थी
मजबूर
थे
हम
उस
से
मोहब्बत
भी
बहुत
थी
Kaleem Aajiz
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ऐसी
हैं
क़ुर्बतें
के
मुझी
में
बसा
है
वो
ऐसे
हैं
फ़ासले
के
नहीं
राब्ता
नसीब
Afzal Ali Afzal
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किसी
बे-वफ़ा
से
बिछड़
के
तू
मुझे
मिल
गया
भी
तो
क्या
हुआ
मेरे
हक़
में
वो
भी
बुरा
हुआ
मेरे
हक़
में
ये
भी
बुरा
हुआ
Mumtaz Naseem
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सर
पर
हवा-ए-ज़ुल्म
चले
सौ
जतन
के
साथ
अपनी
कुलाह
कज
है
उसी
बाँकपन
के
साथ
Majrooh Sultanpuri
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किसी
के
तुम
हो
किसी
का
ख़ुदा
है
दुनिया
में
मेरे
नसीब
में
तुम
भी
नहीं
ख़ुदा
भी
नहीं
Akhtar Saeed Khan
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ओ
सखी
मन
उसका
तो
तन
भी
उसी
का
हक़
है
उसको
ग़ैर
ये
आँगन
न
चू
में
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Neeraj Neer
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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यार
मुझ
में
ही
कमी
थी
ज़िंदगी
तो
क़ीमती
थी
फूल
सब
थे
ग़ुस्से
के
वो
तितली
मुझपे
बावली
थी
उसने
दिल
को
ऐसे
बाँधा
राग
जैसे
भैरवी
थी
जब
लगूॅं
सबके
गले
मैं
आँखों
से
वो
डाॅंटती
थी
खिड़कियाँ
वो
खोल
देती
तब
यही
बस
आशिक़ी
थी
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Amanpreet singh
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उसे
मुझ
सेे
शिकायत
एक
ये
भी
थी
मुझे
उस
सेे
मोहब्बत
ही
हुई
थी
क्यूँ
Amanpreet singh
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पूछ
लेते
हाल
दिल
का
क्या
हुआ
पामाल
दिल
का
ख़त
नहीं
भेजे
गए
पर
भेजा
था
इर्साल
दिल
का
क्या
गया
तू
दूर
मुझ
सेे
देख
ख़ुद
तू
हाल
दिल
का
मुस्कुरा
कर
रो
पड़े
हम
हाल
है
बेहाल
दिल
का
मैं
नहीं
गाता
के
अब
तो
मर
गया
क़व्वाल
दिल
का
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Amanpreet singh
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छोड़
कर
जाने
लगा
है
हाँ
ये
सच
है
हिज्र
फिर
आगे
खड़ा
है
हाँ
ये
सच
है
उसकी
काफ़ी
आदतें
बाक़ी
हैं
मुझ
में
फिर
भी
वो
ज़िद
पर
अड़ा
है
हाँ
ये
सच
है
यार
मैं
फिर
से
उसी
का
हो
गया
हूॅं
जो
न
समझे
क्या
वफ़ा
है
हाँ
ये
सच
है
बाद
में
उसके
बदन
से
क्या
मिलेगा
बस
कहूँगा
जी
चखा
है
हाँ
ये
सच
है
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Amanpreet singh
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तेरे
बिन
दिन
गुज़ार
सकता
हूॅं
ज़िंदगी
तुझपे
वार
सकता
हूॅं
जीतने
के
लिए
यहाँ
पर
मैं
तीर
अपनों
के
मार
सकता
हूॅं
ख़ास
तेरे
हैं
इसलिए
चुप
हूॅं
वरना
सर
से
उतार
सकता
हूॅं
पेड़
पर
छुप
के
मुझको
कहते
हैं
कर
तो
मैं
भी
शिकार
सकता
हूॅं
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Amanpreet singh
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