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Amanpreet singh
tere bin din guzaar saka hoon
tere bin din guzaar saka hoon | तेरे बिन दिन गुज़ार सकता हूॅं
- Amanpreet singh
तेरे
बिन
दिन
गुज़ार
सकता
हूॅं
ज़िंदगी
तुझपे
वार
सकता
हूॅं
जीतने
के
लिए
यहाँ
पर
मैं
तीर
अपनों
के
मार
सकता
हूॅं
ख़ास
तेरे
हैं
इसलिए
चुप
हूॅं
वरना
सर
से
उतार
सकता
हूॅं
पेड़
पर
छुप
के
मुझको
कहते
हैं
कर
तो
मैं
भी
शिकार
सकता
हूॅं
- Amanpreet singh
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हम
लोग
चूंकि
दश्त
के
पाले
हुए
हैं
सो
ख़्वाबों
में
चाहे
झील
हों,
आँखों
में
पेड़
हैं
Siddharth Saaz
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इक
मुहब्बत
से
भरी
उस
ज़िंदगी
के
ख़्वाब
हैं
पेड़
दरिया
और
पंछी
तेरे
मेरे
ख़्वाब
हैं
Neeraj Nainkwal
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परिंद
क्यूँँ
मिरी
शाख़ों
से
ख़ौफ़
खाते
हैं
कि
इक
दरख़्त
हूँ
और
साया-दार
मैं
भी
हूँ
Asad Badayuni
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रुकें
तो
धूप
से
नज़रें
बचाते
रहते
हैं
चलें
तो
कितने
दरख़्त
आते
जाते
रहते
हैं
Charagh Sharma
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एक
पत्ता
शजर-ए-उम्र
से
लो
और
गिरा
लोग
कहते
हैं
मुबारक
हो
नया
साल
तुम्हें
Unknown
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ये
सोच
के
माँ
बाप
की
ख़िदमत
में
लगा
हूँ
इस
पेड़
का
साया
मिरे
बच्चों
को
मिलेगा
Munawwar Rana
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मुझ
पर
निगाह-ए-नाज़
का
जब
जादू
चल
गया
मैं
रफ़्ता
रफ़्ता
क़ैस
की
सोहबत
में
ढल
गया
ज़ुल्फें
उन्होंने
खोल
के
बिखराई
थी
शजर
फिर
देखते
ही
देखते
मौसम
बदल
गया
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Shajar Abbas
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परिंदे
लड़
ही
पड़े
जाएदाद
पर
आख़िर
शजर
पे
लिक्खा
हुआ
है
शजर
बराए-फ़रोख़्त
Afzal Khan
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जिसे
तुम
काट
आए
उस
शजर
को
ढूँढता
होगा
परिंदा
लौटकर
के
अपने
घर
को
ढूँढता
होगा
Bhaskar Shukla
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है
नार
दोस्तों
कसरत
से
मुंतज़िर
उनकी
ग़म-ए-हुसैन
में
जो
कारोबार
करते
हैं
ये
सब
हैं
गुलशन-ए-हैदर
के
गुल
शजर
ज़ैदी
ये
गुल
तब्बसुम-ए-लब
से
शिकार
करते
हैं
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Shajar Abbas
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इक
बदन
की
तलब
लग
रही
है
मुझे
और
यूँँ
बे-सबब
लग
रही
है
मुझे
ज़िंदगी
में
नहीं
ख़ास
कुछ
भी
मगर
साथ
तेरे
ग़ज़ब
लग
रही
है
मुझे
आस
कितनी
लगाए
हुए
बैठे
हैं
लड़की
पेड़ों
सी
अब
लग
रही
है
मुझे
होंठ
उसके
दिखे
थे
मुझे
एक
दिन
ज़िंदगी
तब
से
लब
लग
रही
है
मुझे
बात
जो
बा-अदब
लग
रही
है
तुम्हें
वो
बड़ी
बे-अदब
लग
रही
है
मुझे
उसका
कहना
है
मैं
ख़ुद
बताऊँ
उसे
ये
तलब
कब
की
अब
लग
रही
है
मुझे
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Amanpreet singh
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हमारे
बाद
फिर
उसकी
नज़र
में
कौन
था
वैसे
हमारे
बाद
चश्मों
से
नमी
किसने
निकाली
थी
Amanpreet singh
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सोच
कर
तुझको
ही
सजाया
है
दिल
ज़मीं
पे
शजर
लगाया
है
जो
महक
है
गुलाब
के
अंदर
सारी
उस
जिस्म
की
ये
माया
है
आग
उसकी
भी
मिटती
जाती
है
जिस्म
पे
थूकने
वो
आया
है
बाग़
में
फूल
बन
के
बैठा
हूॅं
दिल
मेरा
तितलियों
पे
आया
है
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Amanpreet singh
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प्यार
में
पड़
के
मर
जिया
जाए
उसकी
बातों
से
डर
लिया
जाए
ज़िंदगी
पड़
गई
मोहब्बत
में
और
अब
क्या
ही
तो
किया
जाए
प्यास
ही
बस
भरी
है
आँखों
में
दश्त
के
घर
में
घर
किया
जाए
आज
भी
याद
है
तुम्हें
बातें
आज
फिर
बात
पर
जिया
जाए
ग़म
से
इतने
भरे
हुए
हैं
अब
ग़म
का
प्याला
न
भर
पिया
जाए
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Amanpreet singh
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ज़िंदगी
अब
उजाड़
दूँगा
मैं
तेरा
हुलिया
बिगाड़
दूँगा
मैं
एक
ही
शख़्स
है
इधर
मेरा
उसको
भी
छोड़-छाड़
दूँगा
मैं
बालों
को
नोच
कर
के
बैठा
हूॅं
सर
भी
अब
तोड़-ताड़
दूँगा
मैं
जा
वहाँ
से
वो
चाकू
लेकर
आ
आज
काग़ज़
ये
फाड़
दूँगा
मैं
उसको
फिर
से
गले
लगा
कर
मैं
कुर्ते
की
मिट्टी
झाड़
दूँगा
मैं
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Amanpreet singh
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