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Amanpreet singh
ha
ha | हमें यूँँ मात दी उसने तू कह कर
- Amanpreet singh
हमें
यूँँ
मात
दी
उसने
तू
कह
कर
भुला
दी
बात
सब
उसने
तू
कह
कर
- Amanpreet singh
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तुम्हें
ये
किसने
कहा
रब
को
नहीं
मानता
मैं
ये
और
बात
कि
मज़हब
को
नहीं
मानता
मैं
Bhaskar Shukla
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बात
करते
हुए
बे-ख़याली
में
ज़ुल्फ़ें
खुली
छोड़
दी
हम
निहत्थों
पे
उसने
ये
कैसी
बलाएँ
खुली
छोड़
दी
साथ
जब
तक
रहे
एक
लम्हे
को
भी
रब्त
टूटा
नहीं
उसने
आँखें
अगर
बंद
कर
ली
तो
बाँहें
खुले
छोड़
दी
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Khurram Afaq
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उसे
किसी
से
मोहब्बत
थी
और
वो
मैं
नहीं
था
ये
बात
मुझ
सेे
ज़ियादा
उसे
रुलाती
थी
Ali Zaryoun
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बात
ऐसी
भी
भला
आप
में
क्या
रक्खी
है
इक
दिवाने
ने
ज़मीं
सर
पे
उठा
रक्खी
है
इत्तिफ़ाक़न
कहीं
मिल
जाए
तो
कहना
उस
सेे
तेरे
शाइर
ने
बड़ी
धूम
मचा
रक्खी
है
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Ismail Raaz
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ये
है
पहली
बात
तुझ
सेे
इश्क़
है
दूसरी
ये
बात,
पहली
बात
सुन
Siddharth Saaz
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कुछ
बात
है
कि
हस्ती
मिटती
नहीं
हमारी
सदियों
रहा
है
दुश्मन
दौर-ए-ज़माँ
हमारा
Allama Iqbal
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जब
मसअले
न
हल
हो
सकें
बात-चीत
से
फिर
जंग
ही
लड़ो
कि
ज़माना
ख़राब
है
shaan manral
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जो
चुप-चाप
रहती
थी
दीवार
पर
वो
तस्वीर
बातें
बनाने
लगी
Adil Mansuri
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कू-ब-कू
फैल
गई
बात
शनासाई
की
उस
ने
ख़ुश्बू
की
तरह
मेरी
पज़ीराई
की
Parveen Shakir
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मुझे
अँधेरे
से
बात
करनी
है
सो
करा
दो,
दिया
बुझा
दो
कुछ
एक
लम्हों
को
रौशनी
का
गला
दबा
दो,
दिया
बुझा
दो
रिवाज़-ए-महफ़िल
निभा
रहा
हूँ
बता
रहा
हूँ
मैं
जा
रहा
हूँ
मुझे
विदा
दो,
जो
रोना
चाहे
उन्हें
बुला
दो,
दिया
बुझा
दो
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Vikram Gaur Vairagi
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हमारे
बाद
उसकी
इस
नज़र
में
कौन
था
वैसे
हमारे
बाद
चश्मों
से
नमी
किसने
निकाली
थी
Amanpreet singh
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ख़ुदा
के
घर
से
मैं
दूरी
बनाऊँगा
जी
फिर
मैं
घर
में
मजबूरी
बनाऊँगा
दिखा
दूँगा
दिए
को
एक
दिन
मैं
ख़ुद
यूँँ
मैं
ख़ुद
रौशनी
पूरी
बनाऊँगा
अभी
घर
में
नया
महमान
आया
है
तो
पहले
तो
मैं
मज़दूरी
बनाऊँगा
मुझे
चेहरा
दिखाई
तो
दे
तब
जानूँ
यूँँ
बिन
देखे
तो
क्या
दूरी
बनाऊँगा
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Amanpreet singh
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आज
के
दिन
गर
बुलाया
होता
उसने
ईद
फिर
मेरी
भी
सबके
जैसी
होती
Amanpreet singh
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रख
ली
तुम
सेे
भी
दोस्ती
मैंने
और
फिर
कर
ली
शा'इरी
मैंने
उसकी
बातें
करो
सभी
मुझ
सेे
देखनी
फिर
है
बे-ख़ुदी
मैंने
वो
मोहब्बत
से
बाज़
आए
तो
उसको
करना
है
अजनबी
मैंने
उसकी
बातें
बता
दी
है
तुमको
तुम
सेे
भी
कर
ली
दुश्मनी
मैंने
आपसे
बात
कर
के
लगता
है
आपकी
जी
है
ज़िंदगी
मैंने
वो
अँधेरे
से
डरती
रहती
थी
घर
जला
कर
दी
रौशनी
मैंने
जब
तेरे
साथ
दिल
नहीं
लगता
फिर
तो
करनी
है
ख़ुद-कुशी
मैंने
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Amanpreet singh
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यार
मुझ
में
ही
कमी
थी
ज़िंदगी
तो
क़ीमती
थी
फूल
सब
थे
ग़ुस्से
के
वो
तितली
मुझपे
बावली
थी
उसने
दिल
को
ऐसे
बाँधा
राग
जैसे
भैरवी
थी
जब
लगूॅं
सबके
गले
मैं
आँखों
से
वो
डाॅंटती
थी
खिड़कियाँ
वो
खोल
देती
तब
यही
बस
आशिक़ी
थी
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Amanpreet singh
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