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Parvez Zaami
ishq ka kuchh sila diye hote
ishq ka kuchh sila diye hote | इश्क़ का कुछ सिला दिए होते
- Parvez Zaami
इश्क़
का
कुछ
सिला
दिए
होते
क़ब्र
पर
गुल
चढ़ा
दिए
होते
शे'र
अपने
मक़ाम
तक
जाते
आप
गर
मुस्कुरा
दिए
होते
पर्दा
गर
मह-ज़बीं
उठा
देते
हम
ने
दीपक
बुझा
दिए
होते
रोज़-ए-महशर
हिसाब
देना
है
कुछ
सितम
तो
गिना
दिए
होते
यार
तस्कीन-ए-क़ल्ब
हो
जाती
कोई
तोहमत
लगा
दिए
होते
कार-गर
मेरी
मौत
हो
जाती
चंद
आँसू
बहा
दिए
होते
तीन
लफ़्ज़ों
की
बात
थी
'ज़ामी'
काश
हम
लब
हिला
दिए
होते
- Parvez Zaami
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मौत
ही
इंसान
की
दुश्मन
नहीं
ज़िंदगी
भी
जान
ले
कर
जाएगी
Arsh Malsiyani
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मौत
न
आई
तो
'अल्वी'
छुट्टी
में
घर
जाएँगे
Mohammad Alvi
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अचानक
छूट
जाती
है
रियासत
अचानक
मौत
आती
है
सभी
को
Meem Alif Shaz
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ये
भी
अच्छा
हुआ
मौत
ने
आकर
हमको
बचा
लिया
वरना
हालत
ऐसी
थी,
हम
शायर
भी
हो
सकते
थे
Bhaskar Shukla
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मौत
आए
तो
कुछ
पल
पहले
पता
चले
फ़ोन
लगाना
है
मुझको
इक
लड़की
को
Tanoj Dadhich
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मौत
को
हम
ने
कभी
कुछ
नहीं
समझा
मगर
आज
अपने
बच्चों
की
तरफ़
देख
के
डर
जाते
हैं
Shakeel Jamali
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शायद
कि
मौत
ही
हो
मेरे
दर्द
का
इलाज
मतलब
कि
उसको
दिल
से
निकाला
न
जाएगा
Dev Niranjan
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बद-हवा
सेी
है
बे-ख़याली
है
क्या
ये
हालत
भी
कोई
हालत
है
ज़िंदगी
से
है
जंग
शाम-ओ-सहर
मौत
से
शिकवा
है
शिकायत
है
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Chandan Sharma
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ज़िंदगी
और
चल
नहीं
सकती
आने
पे
मौत
टल
नहीं
सकती
Afzal Sultanpuri
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आई
होगी
किसी
को
हिज्र
में
मौत
मुझ
को
तो
नींद
भी
नहीं
आती
Akbar Allahabadi
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कुछ
न
कुछ
तो
निस्बत
है
बैर
है
या
उल्फ़त
है
हश्र
का
ये
दिन
और
तुम
क्या
हसीं
क़यामत
है
रंज
क्यूँँ
करे
इस
पर
अपनी
अपनी
क़िस्मत
है
कोई
तो
कहे
मुझ
से
आप
से
मोहब्बत
है
मय-कदा
भी
मंदिर
है
साक़ी
उस
की
मूरत
है
ईद
मेरी
हो
जाए
चाँद
की
ज़रूरत
है
ज़ीस्त
तू
जिसे
कहता
चार-दिन
की
मोहलत
है
ज़िंदगी
फ़साना
है
मौत
ही
हक़ीक़त
है
आते
रहना
तुर्बत
पर
आख़िरी
वसीयत
है
ये
ग़ज़ल
नहीं
'ज़ामी'
ज़िंदगी
की
दौलत
है
आ
गया
ख़ुदा
का
ख़त
'ज़ामी'
की
ज़रूरत
है
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Parvez Zaami
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चश्म-ए-बद-बीन
से
न
देख
हमें
यार
उल्फ़त-शिआर
हैं
हम
लोग
Parvez Zaami
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लोग
रोते
हैं
किसलिए
'ज़ामी'
मौत
तो
इल्तिफ़ात
होती
है
Parvez Zaami
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तीन
लफ़्ज़ों
की
बात
थी
'ज़ामी'
काश
हम
लब
हिला
दिए
होते
Parvez Zaami
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अपने
खूँ
से
चमन
को
सींचा
है
फिर
भी
बे-एतिबार
हैं
हम
लोग
Parvez Zaami
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