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Praveen Sharma SHAJAR
hamse aisa bhala kya nahin ho raha
hamse aisa bhala kya nahin ho raha | हम सेे ऐसा भला क्या नहीं हो रहा
- Praveen Sharma SHAJAR
हम
सेे
ऐसा
भला
क्या
नहीं
हो
रहा
क्यूँँ
कोई
भी
हमारा
नहीं
हो
रहा
आपकी
शर्त
भी
मान
लेते
मगर
फ़ाइदा
भी
तो
अपना
नहीं
हो
रहा
दिल
में
हिम्मत
नहीं
है
मुहब्बत
की
और
बिन
मुहब्बत
गुज़ारा
नहीं
हो
रहा
अब
इबादत
न
ज़ाया'
करो
आज
कल
हम
सेे
वैसे
भी
सजदा
नहीं
हो
रहा
गिरते
पड़ते
यहाँ
तक
मैं
आ
तो
गया
लेकिन
आगे
का
रस्ता
नहीं
हो
रहा
- Praveen Sharma SHAJAR
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हासिल
नहीं
हुआ
है
मोहब्बत
में
कुछ
मगर
इतना
तो
है
कि
ख़ाक
उड़ाना
तो
आ
गया
Amaan Haider
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इश्क़
के
रंग
में
ऐ
मेरे
यार
रंग
आया
फिर
आज
रंगों
का
तेहवार
रंग
हो
गुलाबी
या
हो
लाल
पीला
हरा
आ
लगा
दूँ
तुझे
भी
मैं
दो
चार
रंग
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Afzal Ali Afzal
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मेरा
किरदार
मेरी
बात
कहाँ
सुनता
है
ये
समझदार
मेरी
बात
कहाँ
सुनता
है
इश्क़
है
वादा-फ़रामोश
नहीं
है
कोई
दिल
तलबगार
मेरी
बात
कहाँ
सुनता
है
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Vishal Singh Tabish
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अदावत
मुहब्बत
रफ़ाक़त
नहीं
है
हमें
तुम
सेे
कोई
शिकायत
नहीं
है
दिलों
को
लगाने
लगे
हो
जहाँँ
तुम
वहाँ
तो
किसी
को
मुहब्बत
नहीं
है
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Tiwari Jitendra
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'असद'
ये
शर्त
नहीं
है
कोई
मुहब्बत
में
कि
जिस
सेे
प्यार
करो
उसकी
आरज़ू
भी
करो
Subhan Asad
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किताब-ए-इश्क़
में
हर
आह
एक
आयत
है
पर
आँसुओं
को
हुरूफ़-ए-मुक़त्तिआ'त
समझ
Umair Najmi
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मोहब्बत
में
नहीं
है
फ़र्क़
जीने
और
मरने
का
उसी
को
देख
कर
जीते
हैं
जिस
काफ़िर
पे
दम
निकले
Mirza Ghalib
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तुम्हीं
से
प्यार
मुझको
इसलिए
है
ज़माना
आज़मा
कर
आ
गया
हूँ
Divy Kamaldhwaj
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किसी
के
इश्क़
में
बर्बाद
होना
हमें
आया
नहीं
फ़रहाद
होना
Manish Shukla
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बहुत
आसान
है
कहना,
बुरा
क्या
है
भला
क्या
है
करोगे
इश्क़
तब
मालूम
होगा,
मसअला
क्या
है
Bhaskar Shukla
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मुनाफ़िकों
से
कोई
राब्ता
नहीं
रखता
कि
लौटने
का
तो
मैं
रास्ता
नहीं
रखता
मैं
उस
पे
छोड़
के
बैठा
हूँ
कार
उल्फ़त
भी
वो
एक
शख़्स
जो
पास-ए-वफ़ा
नहीं
रखता
मैं
तोड़
कर
के
दिल
उसका
उसे
रुला
आया
मैं
झूठ-मूठ
का
तो
आसरा
नहीं
रखता
कि
चार
इश्क़
गँवाए
हैं
फिर
भी
ज़िंदा
हूँ
और
आप
कहते
हैं
मैं
हौसला
नहीं
रखता
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Praveen Sharma SHAJAR
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उसकी
बस्ती
में
इंसान
आए
हुए
थे
मैं
क्या
बात
करता
उसने
होंठों
पे
ताले
लगाए
हुए
थे
मैं
क्या
बात
करता
मैंने
कोशिश
बहुत
की
बहुत
बरग़लाया
मगर
कुछ
न
बोली
उसने
दुख
सारे
दिल
में
छुपाए
हुए
थे
मैं
क्या
बात
करता
वो
अकेली
जो
मिलती
तो
लड़ता
झगड़ता
शिकायत
भी
होती
उसकी
शादी
थी
मेहमान
आए
हुए
थे
मैं
क्या
बात
करता
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Praveen Sharma SHAJAR
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मेरे
ख़त
को
अगर
पढ़ना
ज़रा
सा
ग़ौर
से
पढ़ना
मेरे
ख़त
में
शिकायत
के
अलावा
भी
बहुत
कुछ
है
Praveen Sharma SHAJAR
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किसी
की
याद
से
कोई
गुज़ारा
क्या
करे
तुम्हारे
बाद
में
शायर
तुम्हारा
क्या
करे
अगर
कश्ती
की
क़िस्मत
में
लिखा
था
डूबना
कोई
बतलाए
फिर
माँझी
बेचारा
क्या
करे
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Praveen Sharma SHAJAR
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पढ़ने
लिखने
का
शौक़
है
मुझको
आँखें
पढ़ता
हूँ
नज़्में
लिखता
हूँ
Praveen Sharma SHAJAR
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