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Muntazir suraj
kya tha baatin ko zaahir bhi ham rakhte gar
kya tha baatin ko zaahir bhi ham rakhte gar | क्या था बातिन को ज़ाहिर भी हम रखते गर
- Muntazir suraj
क्या
था
बातिन
को
ज़ाहिर
भी
हम
रखते
गर
हम
ने
आसूदगी
रुख़
पे
दायम
रखी
- Muntazir suraj
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हक़
में
हमारे
जो
था
मिला
नहीं
क्या
कुछ
कातिब-ए-तक़दीर
से
गिला
नहीं
क्या
कुछ
पर्दा-नशीं
देख
कर
उस
एक
कली
को
मिस्ल
गुलों
के
वहाँ
खिला
नहीं
क्या
कुछ
लोग
की
इंसानियत
निबाह
रहे
हैं
बीच
हमारे
तो
सिलसिला
नहीं
क्या
कुछ
हार
पर
अपनी
तू
इश्क़
को
न
बुरा
कह
और
तरफ़
देख
अम्सिला
नहीं
क्या
कुछ
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था
कब
किसने
चाहा
रहे
ये
गिला
उम्र
भर
वो
बाशिंदा-ए-दिल
रहे
बे-मिला
उम्र
भर
तवक़्क़ो
न
ख़ुदस
हमें
है
बस
इस
के
सिवा
उन्हें
चाहते
ही
रहें
बिन
सिला
उम्र
भर
यही
इश्क़
है
बीच
हो
फ़ासले
और
मैं
ख़यालों
में
उसके
रहूँ
मुब्तिला
उम्र
भर
तिरे
लम्स
से
जिस
फ़सुर्दा
में
जाँ
आई
थी
बिना
तेरे
वो
गुल
रहा
अध-खिला
उम्र
भर
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शहर
भर
में
हमारे
बस
अब
आप
के
हुस्न-ए-सीरत
की
ही
सुर्खियाँ
उड़ती
हैं
आप
के
गुल-बदन
से
गुलों
को
है
रश्क
आप
की
मेहँदी
पर
तितलियाँ
उड़ती
हैं
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Muntazir suraj
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बस
तुम्हारी
दूरियों
में
पास
ग़म
है
ना-मयस्सर
होने
का
एहसास
ग़म
है
ना-मयस्सर
ही
रहा
वो
हर
तरह
से
राएगाँ
मेरा
रहा
इख़्लास
ग़म
है
दावा
करते
थे
फ़क़त
दीदार
का
जो
चूमकर
क़ाएम
है
उनकी
प्यास
ग़म
है
दस्तयाबी
है
अजब
दुश्वार
सा
फ़न
और
रहा
दिल
भी
मिरा
बे-आस
ग़म
है
बस
कि
हाल-ए-दिल
न
पूछो
श्रेय
हम
सेे
आम
है
मसरूर
हर
पल
ख़ास
ग़म
है
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कहीं
तन्हाई
घर
की
छोड़
हम
बाहर
नहीं
जाते
हमारी
उम्र
में
तो
लोग
मुड़
कर
घर
नहीं
जाते
ख़ुद
अपने
पर
चला
कब
ज़ोर
जो
तुमको
भुलाते
हम
हमारे
बस
में
होता
यह
अगर
हम
मर
नहीं
जाते
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Muntazir suraj
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